गाँव का वो घर

अगरबत्ती की सुगन्घ, पूजा की घंटी,
सुनकर आँखें खुलती थी,
जहां रातें भी दादी की कहानियाँ सुनकर सोती थी,
अब लोग नहीं,
यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी,

लोगों की आवाज, शब्दों की भीड़,
सब कुछ सुना है उस आँगन ने,
प्यारा भरे तकरार,भाई-बहन का प्यार,
सब कुछ देखा है उस आँगन ने,
पूजा करती दादी की घंटी की आवाज,
रोटी बेलती माँ के कंगनों की खन खन,
पुरे घर में गोरैया की तरह फुदकती,
बहनों के पायलों की छन छन,
और ना जाने कितने मधुर आवाजों को,
अपने दामन में संजोये हैं,
ख़ुशी और ग़म की सारी यादों को,
एक धागे में पिरोये हैं,
उस घर ने सबको छत दिया,
समान प्रेम वो सबसे करती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहा पहले किलकारी गुंजा करती थी,

थका हारा जब भी मैं घर आता था,
अपनी नरम मुट्ठी में मुझे छुपा लेता था,
जैसे कोई माँ, बच्चे को आँचल में छुपाया करती है,
उस घर की हर चीज से अलग सा नाता है,
वो शीशम के खम्भे,कत्थई सा दरवाजा,
वो सहमी सी चौखट, अधखुली खिड़कियाँ, सब रस्ता तकती हैं,
बरसों बीत गए उस आँगन को खामोश बैठे हुए,
जो अकेलेपन के नाम से भी डरती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आंगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी।

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