आज सुबह

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“सन्दर्भ : सबेरा तो रोज ही होता है, हम रोज थोड़ा जीते और रोज थोड़ा मरते हैं। आज सोचा, क्यूँ न कुछ लिखते हैं, अपने बारे में, अपने दिन की शुरुआत के बारे में, आज सुबह के बारे में। ”

 

ट्रिंग-ट्रिंग, ट्रिंग-ट्रिंग, ट्रिंग-ट्रिंग ….. मोबाइल के अलार्म की आवाज से जैसे ही आँख खुली तो एहसास हुआ की सुबह के ६ बज चुके हैं। आँखें मलते हुए, कम्बल को अपने चारो तरफ अच्छे से लपेट पालथी मार कर बैठ गया। जब थोड़ी बहुत सुध आयी तो याद आया की आज बैडमिंटन खेलने ६:३० बजे ही निकलना है।

फिर क्या था, पंद्रह मिनट में सारे नित्य कर्म निपटा कर, बैंडमिंटन किट को कंधे से लटकाये मैं घर से निकल गया। अभी नवम्बर का महीना है और ठण्ड ने बैंगलोर में हलकी सी दस्तक दे दी है। बाहर निकलते ही ठंडी हवा के झोकों ने तन में सिहरन सी पैदा कर दी, तब जाकर एहसास हुआ की जल्दी निकलने के चक्कर में मैंने गरम कपडे तो पहने ही नहीं। एक बार सोचा की घर वापस चला जाऊ पर अगले ही पल मन बदल के मैं पैदल ही बैडमिंटन क्लब की तरफ निकल पड़ा।

सारा मोहल्ला वीरान पड़ा था, मानो ठण्ड ने सबको देर तक सुलाने की कसम ले ली हो। थोड़ी दूर आगे चला तो देखा दो कुत्ते बड़े ही शान से मोहल्ले की सड़क पे चहल कदमी कर रहे है। आसमान अभी साफ़ नहीं हुआ था, हलकी सी धुंद थी और सूरज देव ने आँखें खोली ही थी की एक बड़े से बादल के टुकड़े ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया।

मेरे घर से क्लब की दुरी कुछ ५ मिनट की है, मैं हलके पैरों से चलते हुए समय पर क्लब पहुच गया। मेरे बाकी तीनो मित्रगण पहले ही पधार चुके थे, मुझे देखते ही रोहित बोल पड़ा – ” बगल में रहते हो, फिर भी सबसे लेट आते हो। किसी ने सही ही कहा है -चिराग तले अँधेरा . ”

मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं इन बातों का हक़दार था।

फिर घंटे भर का खेल, हमारे माननीय मोदी जी के विमुद्रीकरण के फैसले पर कुछ चर्चा और फिर वापस घर के लिए प्रस्थान। तब तक ८ बज चुके थे और ये समय बहुतों के लिए दिनचर्या शुरू करने का समय होता है।

क्लब से निकलते ही मेरे बाएं तरफ एक छोटी सी इश्तरी की दूकान है, उसकी दूकान खुल चुकी थी। उसके लोहे के इश्तरी से उठता काला धुआं बता रहा था की अभी अभी कोयले में आग लगाईं गयी है।

दो कदम चलते ही कुछ लोग चौराहे पर खड़े दिखाई दिए। ४ उच्च विद्यालय के बच्चे और एक छोटा बच्चा अपनी माँ के साथ वहीँ खड़े होकर विद्यालय की बस का इन्तेजार कर रहे थे।

मैं उन्हें पार कर आगे बढ़ा तो एहसास हुआ की जो मोहल्ला एक घंटे पहले वीरान पड़ा था, वो अब जीवित हो उठा है। ढाप-ढाप की आवाज से जब नजरें मुड़ी तो देखा की एक निम्न वर्गीय परिवार की महिला अपने घर के आँगन में बैठी कपड़ो की जान निकालने में तुली हुयी थी। ठीक उसके उलटी दिशा में एक नौकर, अपनी मालिक की कार को रगड़ रगड़ के चमकाने में लगा था।

सब अपने अपने काम बड़ी तन्मयता के साथ कर रहे थे। काश की मैं इनसे कुछ सिख पाता। यही सब सोचते हुए घर पहुचने ही वाला था की एक भोजपुरी गाने की धुन ने ध्यान खींच लिया।

नजरें घुमा कर देखा तो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति हाथ में मोबाइल लिए सड़क के किनारे बैठे धुप सेक रहा था। गीत काफी मधुर था जो मैंने पहले कभी सुना हुआ था। गाने के बोल थे – कोयल बिन बगिया न शोभे राजा। ये गीत शारदा सिन्हा का गाया हुआ है और काफी लोकप्रिय भी है।

यही गीत गुनगुनाते हुए घर पंहुचा और तैयारी में लग गया, ऑफिस जाने की तैयारी में।

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