तमाशा

कौन जीता है आजकल, किसी और के लिए,
हमने यहाँ रोज, मोहब्बत के तमाशे देखे हैं।

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कर लो मोहब्बत

की दुनिया में आये हो तो,
एक बार मोहब्बत जरूर करना,
खुद के लिए तो उम्र भर जीते हो,
कुछ उम्र किसी और के नाम कर देखना,

एक नशा है ये जिंदगी का,
बिन इसके जिए तो क्या किये,
दो पल की तो जिंदगी है,
एक पल जी लो किसी और के लिए।

इल्म

उन्हें ये इल्म है की हम उनसे मोहब्बत करते हैं,
वर्ना यूँ रोज, झरोखे से हमें निहारा नहीं करती।

दिल मजबूर है

दिन ढल गया है, रात छाई है,
धड़कन पुकारे, तेरी याद आयी है,
हर पल यही सोचु, मैं दूर क्यूँ हूँ?
मिल नहीं सकता, इतना मजबूर क्यूँ हूँ?

रोशन है आसमाँ, खुश है जहाँ,
रंग बिखेर रही है सारी फ़िज़ाँ,
फिर मेरा मन इतना उदास क्यूँ है?
दिल में तड़प सा एहसास क्यूँ है?

सब है यहां,बस तेरी कमी है,
आँखों में मेरे, अब तक नमी है,
तुमसे मिलने को मन मचलता है,
ये पागल तुमसे बहुत प्यार करता है,

हर पल बीते तेरे संग, अब चाहत यही है,
तुम बिन मन नहीं लगता, शायद मोहब्बत यही है,
खुश थे अकेले कभी, अब खुशियाँ लाऊँ कहाँ से,
कह दो गर एक बार तो, तुम्हे छीन लाऊँ जहाँ से।

जब तुम मिले

वक़्त ठहर सा गया होगा,
मोहब्बत की ओस गिरी होगी,
बहती हवाओं ने छुआ था शायद,
जब तुम मिले,

समय की उस पहेली में कुछ ख़ास था,
कुछ तो जोड़ रहा था दिल को हमारे,
एक मुस्कान थी चेहरे पर मेरे,
जब तुम मिले,

कुछ तो बात थी तुम्हारी अदा में,
उलझन और खुशियाँ साथ दिख रही थी,
फिर मेरे हाथों में आया तुम्हारा हाथ,
जब तुम मिले,

कुछ तो बात थी उस छुअन में,
एक अलग एहसास था, और,
दिल की धड़कन बढ़ गयी थी,
जब तुम मिले,

तेरे पलकों के इशारें कुछ तो कह रहे थे,
अब तुम ही बताओ उन इशारों की सदाएँ,
कैसे थे हालात तुम्हारे?
जब हम मिले।

अर्धांगिनी

हमसफ़र की तलाश और सफर लम्बा था,
जहां रुके कदम, वो दर तेरा था,
मिलने की बेचैनी थी और एक एहसास था,
कोई था वहां, जो अब मेरा था,

ख़ुशी क्या होती है, अब मालुम हुआ,
जब भगवान ने मुझे, तुमसे मिला दिया,
पत्नी बनाके, जीने का जरिया बना के,
उम्र भर के लिए ये तोहफा दिया,

वो तोहफा हो तुम, भगवान का मुझे,
जिसे कभी तौल नहीं सकता,
एक प्यार इतना पावन, इतना पवित्र,
जिसे कभी मोल नहीं सकता,

इतना वादा है तुमसे की,
खुद को ढूंढ न पाओगी,
जब मेरी बाहों में आ के,
तुम सीने से लिपट जाओगी,

मेरे जीवन का सबेरा हो तुम,
एक चहकती चिड़िया की तरह,
बड़े लाड से रखूँगा तुम्हे,
एक प्यारी गुड़िया की तरह,

कल तक तुम  मेरी चाहत थी,
अब आदत बन गयी हो,
पहले सिर्फ सोचा करता था,
अब इबादत बन गयी हो।

गाँव का वो घर

अगरबत्ती की सुगन्घ, पूजा की घंटी,
सुनकर आँखें खुलती थी,
जहां रातें भी दादी की कहानियाँ सुनकर सोती थी,
अब लोग नहीं,
यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी,

लोगों की आवाज, शब्दों की भीड़,
सब कुछ सुना है उस आँगन ने,
प्यारा भरे तकरार,भाई-बहन का प्यार,
सब कुछ देखा है उस आँगन ने,
पूजा करती दादी की घंटी की आवाज,
रोटी बेलती माँ के कंगनों की खन खन,
पुरे घर में गोरैया की तरह फुदकती,
बहनों के पायलों की छन छन,
और ना जाने कितने मधुर आवाजों को,
अपने दामन में संजोये हैं,
ख़ुशी और ग़म की सारी यादों को,
एक धागे में पिरोये हैं,
उस घर ने सबको छत दिया,
समान प्रेम वो सबसे करती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहा पहले किलकारी गुंजा करती थी,

थका हारा जब भी मैं घर आता था,
अपनी नरम मुट्ठी में मुझे छुपा लेता था,
जैसे कोई माँ, बच्चे को आँचल में छुपाया करती है,
उस घर की हर चीज से अलग सा नाता है,
वो शीशम के खम्भे,कत्थई सा दरवाजा,
वो सहमी सी चौखट, अधखुली खिड़कियाँ, सब रस्ता तकती हैं,
बरसों बीत गए उस आँगन को खामोश बैठे हुए,
जो अकेलेपन के नाम से भी डरती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आंगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी।

जब मिलेंगे

चाँदनी में लिपटी जमीं होगी,
तारों से सजा आसमाँ होगा,
रंग बिरंगी बत्तियाँ रौशन होगी,
खुशबू में नहाया शमाँ होगा,
 
कुछ कदम थिरकेंगे ख़ुशी में,
मधुर गीतोँ का चित्रहार होगा,
आँखों में चाहत के जुगनू चमकेंगे,
जब उनका सामने से दीदार होगा,
 
आँखों से आँखें मिलेंगी,
बिन कहे बातों का इजहार होगा,
बंध जाएंगे जन्मों के बंधन में,
जब मंगल मंत्रों का उच्चार होगा,
 
दूल्हा दुल्हन होंगे हम,
वादों और कसमों का साथ होगा,
कुछ ऐसा होगा शमाँ,
जब मेरे हाथों में उनका हाथ होगा।

अतीत

ढूंढ रहा था कुछ,
बंद लिफाफों में,
दिख गए,
कुछ अतीत के टुकड़े,
समेट रखे थे,
जिन्हें अलमारी में,
कुछ खत थे मोहब्बत के,
कुछ सुखी पंखुड़ियाँ,
गुलाब की,
कुछ तोहफ़े थे,
मोहब्बत के,
उन तोहफ़ों में, ताजमहल,
मेरा ख़ास है,
 
टूट चुके उन ख्वाबों में,
शायद अब भी कुछ बाकी है,
एक भीनी सी खुशबू,
कुछ तेज धड़कनें,
और बंद आखों में छिपी,
उनके प्यार की नमी।

मेरी पहचान

कुछ ख़ास नहीं थी पहचान मेरी,
बस महबूब था मैं किसी का,
वो आइना थी मोहब्बत की,
खुद को उसमे देख पाता था,
फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ,
मेरी पहचान मुझसे कहीं खो गयी,
जो कल तक किसी का मोहब्बत था,
आज खुद के लिए एक सवाल था,
प्यार में अक्सर ऐसा होता है,
टुटा हुआ दिल भी रोता है,
उसकी यादों को सीने से लगाए,
वो जागता और वो सोता है।