वो सुना झूला

वो झूला, जो बरगद के पेड़ से दो रस्सियों के सहारे लटक रहा है,
वयस्क जीवन की उथल पुथल को देख, मानो बचपन को बुला रहा है,
बचपन की हर शाम, उसी पेड़ की छाँव में झूलते हुए बीती है,
हम तो शायद भूल गए, हमारी याद अब भी वहाँ जीती है,
वो हँसी, वो किलकारी भरना, वो दौड़ना, वो गिरना,
वो पेड़ के चक्कर लगाना, वो थक के झूले पे बैठना,
वो झूला, हर खट्टी मीठी याद को अपने पालने में संजोए है,
हमारी हर याद को समय की धागों में पिरोये है,

हम तो आगे निकल गए, वो झूला वहीँ छूट गया,
बचपन का जो साथी था, वो साथ वही टूट गया,
अब तो बस सूखे पत्तों और टूटी डालियों का साथ है,
वो साथ भी छूट है जाता, जब-जब आती बरसात है,
गाँव छूटा, शहर में आए, करनी आगे की पढ़ाई थी,
वो झूला सुना रह गया, पहली उड़ान जिसने सिखाई थी।

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