मेरी पहचान

कुछ ख़ास नहीं थी पहचान मेरी,
बस महबूब था मैं किसी का,
वो आइना थी मोहब्बत की,
खुद को उसमे देख पाता था,
फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ,
मेरी पहचान मुझसे कहीं खो गयी,
जो कल तक किसी का मोहब्बत था,
आज खुद के लिए एक सवाल था,
प्यार में अक्सर ऐसा होता है,
टुटा हुआ दिल भी रोता है,
उसकी यादों को सीने से लगाए,
वो जागता और वो सोता है।
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जो मिल पाते

अनुराग भरा ह्रदय,
उसमे बसे सन्देश,
एक ख्वाब भरी दुनिया,
कुछ आदर, कुछ स्नेह,
सब कुछ थमा आते,
तेरी कोमल सी हाथों में,
जो हम मिल जाते एक बार।