अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य १० – एकादशी)

बीती रात को नींद नहीं आ रही थी, अवन्ति की सुनाई हर एक बात पल पल आँखों के सामने घूम रही थी। रह रह कर बस यही खयाल आ रहा था की अंकल-आंटी तो फिर भी बड़े है, दुनियादारी समझते हैं, पता नहीं अवन्ति पर क्या बीती होगी। यही सब सोचते सोचते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। सुबह जब माँ चाय लेकर उठाने आयी तब जाकर आँख खुली। चाय पीते पीते मैं ये सोच रहा था की आज शाम को किस जगह की दुर्गा पूजा घूमने जाया जाए पर अचानक याद आया की दुर्गा पूजा का समापन तो कल ही हो गया। ये ख़याल आते ही पता नहीं क्यूँ मन बहुत उदास और अजीब सा महसूस करने लगा था। एक खालीपन के एहसास ने मुझे जकड़ सा लिया था। इन बीते कई दिनों में जो उत्साह और ख़ुशी थी, वो सब कहीं छू मंतर हो गया था। मेरा मन तो बस यही चाह रहा था की ये दुर्गा पूजा हर रोज हो और हमलोग हर शाम को कहीं न कहीं घूमने जाए। मुझे ये सोच कर खुद पर हंसी भी आ रही थी की मैं और मेरा मन, कुछ भी सोचने लग जाता हैं।

चाय पी कर जब आँगन में निकला तो अवन्ति दिखाई दी। वो हाथ में झाड़ू लिए अपने आँगन की सफाई कर रही थी। मुझे देख कर अवन्ति मुस्कुरा रही थी की अचानक उसके चेहरे पर कुछ ऐसे भाव बने जैसे की उसे कुछ याद आया हो। अवन्ति ने अपने हाथ के इशारे से कहा की वो कुछ देर बाद मुझसे मिलने आएगी। मैंने भी इशारा कर दिया की ठीक है, कुछ देर में मिलते है।

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अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ९ – दशमी – शाम-२)

अवन्ति के मम्मी और पापा के चले जाने के बाद अचानक मुझे याद आया की मैंने अभी तक अवन्ति को एक हेल्लो तक नहीं बोला। अवन्ति की तरफ देखा तो वो घर का दरवाजा बंद करने में लगी थी। जब वो मेरी तरफ पलटी तो हम दोनों के मुँह से एक साथ हेल्लो निकला, मानो दोनों ने पहले से तय कर रखा था की एक साथ हेल्लो बोलना है। इस बात से हम दोनों के चेहरे पर एक अच्छी सी मुस्कान आ गयी थी।

“चलो बैठते हैं” – अवन्ति ने सोफे के तरफ इशारा करते हुए कहा। उनका सोफा L-शेप वाला था। मैं आराम से जाकर बैठ गया और अवन्ति को इशारा किया की तुम भी बैठो।
“दो मिनट, मैं बस अभी आयी।” – कहकर वो रसोई में चली गयी।
थोड़ी देर में जब वो वापस हॉल में आयी तो उसके एक हाथ में खिचड़ी की प्लेट थी और दूसरे हाथ में पानी का गिलास।
“मम्मी ने कहा था, की पूजा का प्रसाद जरूर खिलाना, सो मैं ले आयी।” – प्लेट और गिलास टेबल पर रख वो सोफे के दूसरे हिस्से में आराम से पालथी मार बैठ गयी।
“पर मैं अकेले कैसे, तुम भी साथ खाती तो अच्छा लगता। मुझे अकेले खाने में थोड़ा अजीब लगता है।”
“अरे नहीं, तुम खाओ, मैंने बहुत खाया है। अभी थोड़ी भी इच्छा नहीं है खाने की।”
“वैसे भी तुम बहुत ज्यादा ले आयी हो, इतना मैं अकेले नहीं खा पाउँगा। या तो तुम एक और चम्मच ले आओ, साथ में खा लेंगे, नहीं तो एक छोटी सी कटोरी ले आओ मैं थोड़ा सा उसमे निकाल लूंगा। बाकी तुम वापस ले जाना। प्रसाद है न, फेंक नहीं सकता।” – प्लेट को वापस टेबल पर रख कर मैं अवन्ति की तरफ मिन्नत भरी नज़रों से ताक रहा था।
“बड़े जिद्दी हो यार तुम, चलो मैं हारी तुम जीते। मैं एक चम्मच ले आती हूँ, पर सिर्फ साथ दूंगी। ज्यादा नहीं खाउंगी।
“अच्छा ठीक है, पहले तुम लाओ तो सही।”

चम्मच लेकर वो मेरे बगल में आ कर बैठ गयी और हम दोनों इधर उधर की बाते करते करते खा रहे थे। अवन्ति बहुत धीरे और थोड़ा थोड़ा खा रही थी की मुझसे रहा ना गया।

“अरे आराम से, इतनी जल्दी जल्दी खाओगी तो सब तुम ही खा जाओगी।” – मैंने बस यूँही हल्का सा मजाक किया था की उसने खाना छोड़ दिया और मुँह बनाकर बैठ गयी। थोड़ा सा ही सही पर उसे फिर से खाने के लिए मनाना पड़ा मुझे। जब मान गयी तो उसने कुछ चम्मच और खाया और हाथ धोने चली गयी।

जब तक वो आई, मैंने भी अपना हिस्सा ख़तम कर लिया था। मैं प्लेट और गिलास लेकर रसोई की तरफ जा ही रहा था की अवन्ति ने बीच में ही मेरे हाथ से दोनों चीजें छीन ली।

“अरे मैं रख देता, अवन्ति।”
“नहीं, तुम जाओ, बैठो। मैं बस आई”

रसोई में से हाथ पोछते हुए अवन्ति बाहर निकली और आकर सोफे में धंस सी गयी। इस बार वो मेरे वाले सोफे के हिस्से में बैठी थी और हम दोनों के बीच का फासला काफी कम रह गया था।

कुछ देर की शान्ति के बाद अवन्ति ने ही चुप्पी तोड़ी।

“एक बात पुछू, सच सच बताना। तुम्हे मेरे बारे में क्यूँ जानना है?” – उसकी उत्सुक तिरछी निगाहों मुझसे जवाब मांग रही थी।
“हाँ, मैं मानता हूँ की हमें एक दूसरे को जाने हुए कुछ दिन ही हुए हैं और मैं तुम्हारे दोस्तों में भी नहीं आता लेकिन ऐसा लगता है की हम दोनों अच्छे दोस्त बन सकते हैं। जब तक हमारी दोस्ती नहीं हो जाती, तब तक पड़ोसी की तरह ही समझ लो। एक पडोसी को अपने पडोसी की पूरी खबर रहनी चाहिए और जिस तरह से मैंने अपनी माँ से तुम लोगो की बारे में थोड़ा थोड़ा सुना है, उत्सुकता बढ़ गयी है ये जानने की आखिर ऐसा क्या हुआ की कोलकाता का एक परिवार मेटेली में आकर रहने लगा है।” – मैं बस बोले जा रहा था और अवन्ति की नजरें मुझ पर ही टिकी हुई थी।

“और कुछ बोलूँ, या तुम मान गयी हो।”
“बस बस.. और नहीं। मैं समझ गयी। अच्छा सुनो न, मैं एक काम करती हूँ। चाय बनने के लिए चढ़ा देती हूँ, चाय के साथ होगी हमारी बात। क्या कहते हो?”
“ख्याल तो काफी अच्छा है ,चलो फिर रसोई में ही बातें करेंगे।”- मेरा सुझाव था।

स्टोव जली, केतली चढ़ी और अवन्ति ने दो कप के हिसाब से दूध और पानी डाल दी और काफी गंभीर होकर अपने पैर के नाखूनों को देखने लगी। मानो वो कुछ सोच रही थी, फिर धीरे से उसने सर उठाया और मेरी तरफ देखा। मेरी उत्सुक निगाहें साफ़ साफ़ सब बयाँ कर रही थी। अवन्ति समझ रही थी की मैं इंतजार कर रहा हूँ और फिर मेरे कानों में आवाज आयी।

“हमारी कहानी शुरू होती है, कोलकाता के बेहाला नाम के जगह से।”

“मेरे पापा इकलौते संतान हैं और मेरे दादा दादी काफी पहले ही बीमारी से गुजर चुके हैं। बचे हम तीन – मम्मी, पापा और मैं। हमारा पुरखो वाला घर है बेहाला में। घर काफी बड़ा था और हम ठहरे सिर्फ तीन, इसीलिए पापा ने काफी कमरे भाड़ा पर लगा रखा है। थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती है भाड़ा से लेकिन हमारा घर चलता था पापा के चायपत्ती के कारोबार से। यह कारोबार पापा अपने एक दोस्त के साथ मिल कर चलाते थे। मेरे पापा हर तरह के चाय के थोक विक्रेता थे। हमारा काफी नाम था, चायपत्ती के कारोबार में। पापा यहीं डुआर्स(उत्तर बंगाल) से माल(चायपत्ती) उठाते थे और कोलकाता(साउथ बंगाल) में बेचते थे। हमारा कारोबार काफी अच्छा चल रहा था। एक दिन पापा के दोस्त घर पर आये हुए थे एक नए बिज़नेस आईडिया के साथ, जो पापा को जँच गयी। वो दोनों मिलकर कारोबार को और आगे फैलाना चाहते थे पर बड़े कारोबार के लिए पैसा भी बड़ा चाहिए। उन्होंने मार्केट से पैसा उठाने का फैसला किया। चूँकि हमारा नाम अच्छा था, काफी लोगो ने हमारे बिज़नेस आईडिया में पैसा लगाया। पर वही, सब का बुरा समय आता है और हमारा भी आया। पापा के दोस्त अचानक कहीं गायब हो गए, कारोबार के लिए इकट्ठे किये हुए सारे पैसो के साथ दूकान के लाखों रूपए भी साथ ले गए। जिस दिन हमें ये बात पता चली, घर में मातम सा माहौल था। लेनदारों के कर्ज, खरीदारों के उधार और बीच में यूँ पापा के दोस्त का गायब हो जाना बहुत बड़ा सदमा था हम सबके लिए। पापा ने बहुत भागा दौरी की पर कुछ अच्छा नहीं हुआ। पापा ने पुलिस में अपने दोस्त के नाम पर FIR दर्ज करवा दी थी। थाना और कोर्ट के चक्कर लगने लगे क्यूँकि लेनदारों ने पापा और उनके दोस्त पर केस कर दिया था। कुछ समय के लिए तो हम तीनो हंसना तक भूल गए थे। पापा का चेहरा हमसे देखा नहीं जाता था।”

चाय बन गयी थी , और अवन्ति चाय को कप में डाल रही थी।

“आजकल किसी भी इंसान पर भरोसा नहीं कर सकते, तुम्हारे पापा के दोस्त ने इतने सालों की दोस्ती का ये सिला दिया” – मैं बहुत दुखी हो गया था।

“अरे रुको अभी, ये तो दुखों की शुरुआत है।” – अवन्ति ने चाय का कप मुझे पकड़ाते हुए कहा।

“अवन्ति, अब तो मुझे लग रहा है की मैंने बहुत गलत किया ये सब पूछ के। मैंने तुम्हारे सारे दुःख-दर्द फिर से ताजा कर दिए। लेकिन कुछ दिनों से सोच सोच के परेशान भी हो रहा था की पता नहीं क्या हुआ होगा की कोलकाता का एक परिवार मेटेली में आ कर बस गया। अगर मेरी वजह से तुम्हे बुरा लगा है तो मैं माफ़ी मांगता हूँ।” – मुझे काफी बुरा लग रहा था।

“अरे नहीं देव, ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ के बहुत सारे लोगो ने मुझसे यही सवाल पूछा था, पर मैंने सबको टाल दिया। लेकिन पता नहीं क्यों, तुम्हे बताने का मन किया।” – अवन्ति ने मेरा मूड ठीक करने की कोशिश की थी।

“तो ठीक है, आगे की कहानी सुनो फिर।” हम दोनों चाय का कप हाथ में लिए सोफा पर आकर बैठ गए थे।

“पापा को अपने दोस्त से जो धोखा मिला था, उस बात के दो महीने बीत गए थे। इस बीच मेरी उच्च माध्यमिक की परीक्षा भी थी। जाहिर सी बात थी, की मेरी पढ़ाई और परीक्षा दोनों पर इस बात का असर पड़ा था। पापा और मम्मी की तबियत भी ख़राब रहने लगी थी। पापा का दूकान पर जाने का मन नहीं करता था। मालिक के दूकान पर नहीं होने का जो असर होता है, वही दिख रहा था। आमदनी काफी घट गयी थी। दूकान के कर्मचारियों को तनख्वाह देने में भी अब दिक्कत होने लगी थी। धीरे धीरे कर्मचारी लोग भी काम छोड़ने लगे एक एक कर के। अंत में दूकान बंद करने की नौबत आ गयी।

अचानक एक दिन मालबाजार से एक फ़ोन आया। पापा जिस डीलर से चायपत्ती लेते थे, उन्ही का फ़ोन था। उन्होंने बस ये जानने के लिए फ़ोन किया था की इस महीने मेरे पापा का आर्डर क्युं नहीं गया। पापा ने बड़े भारी मन से उन्हें सब कुछ बताया। उन्हें ये सब जान कर बहुत दुःख हुआ। पर वो कुछ कर भी नहीं सकते थे, सिवाये खेद जताने के। उन्होंने फिर फ़ोन करने की बात करके फ़ोन रख दिया।

इस फ़ोन के बाद पापा बहुत देर तक कुछ सोचते रहे। रात के खाने के वक़्त उन्होंने उस सोच से हम दोनों को वाकिब कराया। पापा ने बताया की वो बहुत दिनों से कुछ सोच रहे थे। आज जा कर उन्हें कुछ आईडिया मिला है। पापा चाहते थे की अब कोलकाता में वो रह नहीं पाएंगे। क्यूंकि जिस तरह के हालात है, उन हालातों में फिर से कोलकाता में कारोबार को चलाना नामुमकिन सा लग रहा था। नया माल खरीदने के लिए पैसे तक नहीं बचे थे और हमारा नाम भी खराब हो गया था मार्केट में। अंत में पापा ने बस इतना ही कहा की हमें घर और दूकान दोनों बेचना होगा, तभी जाकर लेनदारों के कर्ज से मुक्ति मिलेगी। इन बातों को बताते वक़्त पापा की आँखों में आंसू थे। मैं और मम्मी बस चुपचाप पापा को सुने जा रहे थे।

कर्ज चुकाने के बाद जो कुछ पैसे बचेंगे उन पैसों से पापा फिर से एक छोटा मोटा कारोबार शुरू करेंगे। चूँकि आजतक उन्होंने चायपत्ती के अलावा और किसी चीज का कारोबार किया ही नहीं था। उन्होंने फिर से चायपत्ती का ही कारोबार करने की सोची थी, पर इस बार अकेले और कोलकाता से बाहर। डुआर्स के कुछ लोग पापा को अच्छे से जानते थे, क्यूंकि कारोबार के सिलसिले में पापा का बहुत बार उधर जाना हुआ था। मालबाजार वाले डीलर के फ़ोन के बाद शायद पापा ने उधर के और भी कई लोगो से बाते कर ली थी और उन्हें अपनी तकलीफ और नए कारोबार के बारे में बताया था। जब उन्हें लगा की वो लोग पापा की हर तरह से मदद करने को तैयार हैं, तभी पापा ने ये बात हम दोनों को बतायी। नए दूकान के लिए उन्होंने मालबाजार वाले डीलर से बात की थी और उन्होंने भी पूरी मदद करने का वादा किया। अब बात रह गयी थी, कोर्ट के केस से छुटकारा पाने की तो उन्होंने रियल स्टेट वालो से बात कर के हमारे मकान और दूकान को सही दाम में बिकवाने की बात की। दूकान को खरीदने वाले तो बहुत मिल गए और हमारी दूकान अच्छे दाम पर बिक भी गयी पर हमारा घर बड़ा था और पुश्तैनी भी तो खरीदार मिलने में वक़्त लग रहा था। पापा की तबियत तो धीरे धीरे सुधर गयी पर मम्मी की हालत बहुत बिगड़ गयी थी। डॉक्टर ने सलाह दी थी की उन्हें एक ऐसे जगह पर ले जाओ जहां प्रकृति के बहुत करीब रहा जा सके। खुली हवा और पेड़ पहाड़ के बीच उनकी तबियत जल्दी ठीक हो जायेगी। मेरी मम्मी की बीमारी कोई शारीरिक नहीं थी, पिछले कुछ महीनो में जो हुआ था उनका बहुत बुरा असर पड़ा था मम्मी की सेहत पर। उनके अंदर बहुत दुःख भरा हुआ था पर वो पापा के सामने कभी जाहिर नहीं की। सब अंदर भरा हुआ था, जिसका असर उनके शरीर पर हुआ। पापा ने पहले सोचा था की जब कोलकाता में सब कुछ निपट जायेगा तो वो मालबाजार में ही घर ले लेंगे और वहीँ अपनी नयी दूकान खोलेंगे। लेकिन जब मम्मी की बात आयी तो डुआर्स के एक जान पहचान के आदमी ने पापा को मेटेली और सामसिंग के बारे में बताया। इन दोनों जगहों में मेटेली नजदीक पड़ता था मलबाज़ार से। पापा ने फिर तय किया की कोलकाता से सब निपटा के मेटेली में घर लेंगे और मालबाज़ार में अपनी दूकान खोलेंगे।

इस बीच हमने अपने घर में रहने वाले सारे लोगो को घर खाली करने को कह दिया था। महीने भर का इंतजार और फिर एक खरीदार मिला जो हमारा घर खरीदना चाहता था। बाजार के भाव से थोड़ा कम पर ठीक ठाक दाम मिल रहा था तो पापा ने आख़िरकार घर उनके नाम कर दिया। हफ्ते भर बाद जब पापा को रकम मिली तो उन्होंने सबसे पहले लेनदारों से बात की और कोर्ट के बाहर ही उनसे सारी बात निपटा ली। चिंता रह गयी थी तो अब एक बात की, मेटेली में घर लेना है। उसके लिए पापा ने अपने जान पहचान वाले लोगो से बात की तो इसी घर के बारे में पता चला और पापा ने बात पक्की कर दी। अब पापा अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे। कुछ ही दिनों में आखिर वो रात भी आयी जो हमारी आखिरी रात थी, हमारे खुद के घर में। ये सोच कर ही कितना अजीब लगता है, है न देव?” – अवन्ति ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।

“हाँ अवन्ति, उस पल के बारे में सोच कर ही मेरा मन दहल गया है, की कैसे बीती होगी वो रात?” – उदासी उमड़ आयी थी मेरे चेहरे पर।

“वो रात बहुत अजीब थी, हम तीनो एक ही कमरे में साथ लेटे हुए थे। कोई बात नहीं कर रहा था, सब अपने अंदर के ग़म को अपने तक ही सिमित रखना चाहते थे। क्यूंकि बातों बातों में अगर कोई एक टूट जाता तो फिर कोई सम्भल नहीं पाता।
उस रात कोई नहीं सो पाया, पूरी रात हम लोग बस अपने घर की दीवार और छत निहार रहे थे।” – अवन्ति की दोनों आँखों में मोटे मोटे आंसू की बूँदें छलछला उठी थी।

“अवन्ति, जरा चाय की तरफ भी एक नजर डाल लो। चाय की कप कब से तुम्हारे चेहरे को ताक रही है की तुम कब उसे अपने हाथों में लोगी। जरा रहम करो उस बेचारे पर। कहानी तो चलती रहेगी।” – मैंने अवन्ति को बीच में रोकते हुए कहा।

अवन्ति ने मेरी तरफ देखा और मुस्काई फिर जैसे ही उसने अपनी पलकें झपकाई, आँसू की दो बूँदें सूखे गालों पर एक रेखा सी बनाती हुयी फिसल गयी। उसने बड़ी मुश्किल से अपने जज्बातों पर काबू किया और चाय की एक चुस्की लेकर फिर आगे की आपबीती बताने लगी।

“वो रात तो बस हमारे आँखों में ही बीत गई। सुबह से ही मैं और मम्मी कुछ सामान समेटने में लग गए। पापा को बाहर कुछ काम था तो वो नास्ता कर के निकल गए। शाम को हमारी ट्रैन थी सियालदह रेलवे स्टेशन से। दिन भर हमने पैकिंग की और शाम को जब कार आ गयी तो हम तीनो घर के बाहर खड़े आखिरी बार बड़े ही कातर मन से अपने घर को निहार रहे थे। मम्मी और पापा की तरफ देखने की मेरी हिम्मत तो थी नहीं और मेरे आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बड़े ही भारी मन से हमने अपने घर को अलविदा कहा और चुपचाप कार में बैठ गए। और इस तरह १४-१५ घंटे की यात्रा के बाद हम लोग यहाँ आ गए। मुझे अब भी याद है कैसे तुम्हारी माँ हमारे लिए दोपहर का खाना बनाकर लायी थी। तुम्हारी माँ बहुत अच्छी है देव।” – अवन्ति ने चाय की आखिरी चुस्की ली।

“सॉरी अवन्ति, इतना कुछ हो गया होगा, इसका मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था।” – अवन्ति का रुआँसा चेहरा देख मुझे बहुत बुरा लग रहा था।

“नहीं देव, सॉरी बात बोलो। मुझे भी कोई ऐसा चाहिए था जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ। मुझे अच्छा लगा जिस तरह से तुमने मुझे सुना और अपनी बात कही। थैंक्स देव।”

“मैंने शायद कभी तुम्हे बताया था की मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ, अगर तुम्हे वो बात याद है तो आज ये साबित भी हो गया।” – मेरी इस बात पर हम दोनों हंस रहे थे और माहौल थोड़ा हल्का हो गया था।

“अच्छा अवन्ति, तो फिर तुम्हारी पढ़ाई?”
“उच्च माध्यमिक की परीक्षा तो मैं तब दे ही रही थी, जब ये झमेला चल रहा था और मेरे यहाँ आने तक रिजल्ट भी आ गया था। तुम्हे ये जान कर ख़ुशी होगी की मैंने फर्स्ट डिवीज़न से पास किया है। बात रही आगे की पढ़ाई की तो मैंने यहाँ पर मालबाजार कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स में दाखिला ले लिया है। मुझे शुरू से ही इंग्लिश पढ़ने का बड़ा शौक था, वो शौक अब पूरा हो रहा है।” – अवन्ति की आँखों में एक अलग सी चमक थी ये बताते हुए।

“वैसे अंकल ने यहाँ पर किस तरह का कारोबार शुरू किया है? इतना तो पता है की चायपत्ती का है, पर क्या फिर से कोलकाता की तरह थोक में खरीद बिक्री कर रहे हैं या कुछ और?” – कब से मेरे मन में जिज्ञासा थी।

“नहीं नहीं, कारोबार तो चायपत्ती का ही है, पर कोलकाता की तरह नहीं। यहाँ पर पापा ने कच्ची चाय की पत्ती को चाय बागान से सीधे फैक्ट्री तक पहुंचाने का काम शुरू किया है। कोलकाता से जो कुछ पैसे बचे थे पापा ने उससे दो पिकअप ट्रक खरीदा है और चार लोगों को नौकरी पर रखा है। इस काम में मालबाजार वाले चाय के डीलर ने काफी मदद की और अब ये काम धीरे धीरे पटरी पर आ रहा है।”

“अच्छा, हाँ इस काम के बारे में मुझे पता है। मेरे एक दोस्त के पापा भी इसी काम से जुड़े हुए हैं। शुरुआत के लिए ये काम अच्छा है, धीरे धीरे अंकल को और भी आइडियाज मिलेंगे की कैसे कारोबार को आगे बढ़ाया जाए।”

“हाँ पापा भी यही बोल रहे थे। एकबार ये वाला काम सही से चल जाये फिर पापा और कुछ सोचेंगे।”

“ठीक ही है, एक साथ दो-चार जगह हाथ लगाने से अच्छा है की पहले एक काम ठीक से चल पड़े। बाकी तो फिर होता ही रहेगा। चलो ये सब तो काफी अच्छा हुआ, और….. ” – मैं कुछ कहने ही वाला था की दरवाजे की घंटी बजी। शायद अंकल-आंटी आ गए थे।

“अरे बेटा, तुम अभी तक यहीं हो। चलो अच्छा हुआ, अवन्ति का मन लग गया होगा। – अवन्ति के पापा उसके पास आकर बैठ गए थे।
“और बेटा, अवन्ति ने तुम्हे कुछ खिलाया की नहीं।” – आंटी अवन्ति की तरफ देखते हुए मुझसे पूछ रही थी।

“नहीं आंटी, बस प्रसाद खिलाया।” – मैं अवन्ति की तरफ देख हल्की हल्की शैतानो वाली हंसी हंस रहा था।

“कोई बात नहीं बेटा, तुम बस बैठो। मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना बना के लाती हूँ। ये अवन्ति तो कोई काम की नहीं है, मेहमान को भूखा रख दिया।” -आंटी भी मेरे साथ थी।

थोड़े बहुत मजाक के बाद मैंने सबसे विदा ली और जब अवन्ति दरवाजे तक छोड़ने आयी तो मैंने उसे याद दिलाया।

“मेरा एक सवाल अधूरा रह गया आज। फिर कभी पूछूंगा। चलो बाय। गुड नाईट।”

“गुड नाईट। टेक केयर।” – अवन्ति ने हाथ हिलाते हुए विदा किया।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ९ – दशमी – शाम)

दोपहर को खाना खाने के बाद मैं लेट गया था, पर नींद ही नहीं आयी। नींद नहीं आने का कारण शायद अवन्ति थी, शाम को उसकी मम्मी ने बुलाया था और मैं लेट नहीं होना चाहता था। अवन्ति की माँ के ऊपर मैं एक अच्छी छाप छोड़ना चाहता था। इसीलिए जैसे ही घड़ी की सुई ने पाँच बजाया, मैं झटपट तैयार होकर, अच्छी सी खुशबु वाली परफ्यूम लगा के आँखें झपकते ही अवन्ति के घर के दरवाजे पर खड़ा घण्टी बजा रहा था।

“अरे बेटे तुम!, आओ आओ, अंदर आ जाओ।” – अवन्ति की माँ ने दरवाजा खोला।

“आप कहीं जा रही हैं क्या?”- आंटी के कपड़ों को देख मुझे लगा की कहीं जाने के लिए आंटी बस निकलने ही वाली थी।

कलाई में घडी पहनते हुए अंदर के कमरे से अंकल भी निकल कर आये तो मैंने उन्हें नमस्ते किया।

“हाँ देव, हम दोनो बस निकल ही रहे हैं। आज मेरे एक दोस्त ने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी है। हमलोगो को आते आते लेट होगी, तो तुम कुछ देर अवन्ति के साथ रह जाना। हम उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे, पर उसकी जिद है की वो पार्टी में नहीं जायेगी। आजकल के बच्चे और उनकी जिद। हम माँ बाप को ही हार माननी पड़ती है।” – अंकल जूता पहनने में लगे थे।

“सॉरी बेटा, तुम्हे यूँ बुला कर मैं ही बाहर जा रही हूँ, अच्छा नहीं लग रहा।”- आंटी का चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था। शायद उनकी इच्छा नहीं थी जाने की पर अंकल के कहने पर जा रही होंगी। मैं शायद उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

“कोई बात नहीं आंटी, आज आप घूम कर आइये। आपका घर कोई दूर थोड़े ना है, मैं फिर आ जाऊँगा जब आप घर पर रहोगी।” – मन ही मन मैं खुश हो रहा था की अवन्ति के साथ अकेले समय बिताने का इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था।

घर के हॉल में खड़े हम तीनों बाते कर रहे थे और अवन्ति अपने कमरे के दरवाजे से टिक कर खड़ी थी और हमारी बातें सुन  कर तरह तरह के चेहरे बना रही थी।

“अवन्ति, इधर आओ और देव के लिए कुछ नास्ता बना लो और हाँ, पूजा का प्रसाद देना मत भूलना। – आंटी ने अवन्ति को आवाज लगाते हुए कहा।
“ठीक है तो बेटा, तुम दोनों थोड़ा टाइम पास करो। हम दोनों आते हैं।”- अवन्ति के पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा।

मेरे कंधे पर पड़े उस हाथ ने मुझे बहुत कुछ कह दिया। अंकल शायद ये कहना चाहते थे की अपनी बेटी को तुम्हारे भरोसे छोड़े जा रहा हूँ। मेरा भरोसा बरक़रार रखना।

“अच्छी बात है अंकल, आप दोनों अच्छे से जाइए और जल्दी आइए। हमें आपका इन्तेजार रहेगा।” – मैं और अवन्ति अगल बगल में खड़े अंकल आंटी को बाय बोल रहे थे।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ८ – दशमी – सिन्दूर खेला)

हमारे बंगाल में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन यानी की दशमी के रोज सभी विवाहित स्त्रियाँ लाल पार वाली सफ़ेद साड़ी पहनती है और सुबह सुबह सुबह तैयार होकर सिन्दूर की थाली सजाये अपने मुहल्ले के पूजा पंडाल में पहुँच जाती है। पहले माँ दुर्गा को सिन्दूर लगाया जाता है फिर सब स्त्रियाँ एक दूसरे को सिन्दूर लगाती हैं और हम जैसे नवयुवक और नवयुवती उन स्त्रियों को पैर छूकर प्रणाम करते हैं। आशीर्वाद के रूप में हमारे गालों पर सिन्दूर लगाया जाता है। दशमी के दिन रंग सिर्फ दो दिखाई देंगे, पर माहौल कभी रंग बिरंगा होता है।

मैं भी उस दिन काफी सुबह उठ गया था, फिर नहा धोकर मम्मी के साथ पहुँच गया पूजा पंडाल। वहाँ पहुँचते ही मेरी नजर जिसे ढूंढ रही थी, वो एक कोने में खड़ी मिल गयी। उसकी माँ लाइन में खड़ी थी, माँ दुर्गा की प्रतिमा पर सिन्दूर लगाने के लिए। मेरी माँ को देखते ही उन्होंने अपने पास बुला लिया और दोनों बातें करते करते साथ में प्रतीक्षा करने लगे।

अब मैं रह गया अकेला, पर ज्यादा देर नहीं। कुछ ही मिनटों में अवन्ति की आवाज सुनाई दी।

“तब से तुम्हे बुला रही हूँ, सुनाई नहीं दिया क्या?”

“हाँ ?” – मैंने चौंकते हुए जवाब दिया।

“नहीं, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा। यहाँ शोर बहुत ज्यादा है ना।” – मैंने सफाई दी।

सफ़ेद चूड़ीदार, लाल चुन्नी और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी। इस सीधे सादे परिधान में वो और सुन्दर लग रही थी।

“चलो अब तो मैं ही आ गयी तुम्हारे पास, तब से अकेले खड़े खड़े बोरियत हो गयी थी।”- यही कहते कहते वो मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी थी।

वो अपने शहर के दुर्गा पूजा के बारे में बताने लगी और मैं बड़े ध्यान से उसकी तरफ देखते हुए उसकी बातें सुन रहा था। तब जाकर मुझे पता चला की वो कोलकाता की रहने वाली है। मन में कई सवाल भी उठे, की ऐसा क्या हुआ होगा की कोलकाता में रहने वाला परिवार अचानक मेटेली जैसे छोटे जगह पर आकर बसने की कोशिश कर रहा है। मैं यही सब सोच रहा था की हम दोनों की माँए एक दूसरे को सिन्दूर लगाते हुए हमारे पास आ रहे थे। पास आते ही हम दोनों ने दोनों माँओ को प्रणाम किया और हमारे गालों पर भी सिन्दूर लगा दिया गया। मेरा चेहरा पता नहीं कैसा दिख रहा था पर अवन्ति का चेहरा सिन्दूर की लालिमा से चमक सा गया था। बड़ी प्यारी लग रही थी।

“अच्छा तो तुम देव हो?” – अवन्ति की माँ ने मुझसे पूछा।

“जी, आंटी” – मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“ठीक है तो बेटा, मैं और तुम्हारी माँ, घर जा रहे हैं। तुम दोनों को अगर कुछ देर और यहाँ रहना है तो रहो पर दिन के खाने तक वापस आ जाना। और हाँ बेटा, तुम्हे आज शाम को हमारे घर आना है।” – जाते जाते उन्होंने मुझे निमंत्रण भी दे दिया।

उनके जाते ही मेरे कुछ दोस्त लोग आ गए और मैंने उन सभी को अवन्ति से मिलाया। हमलोग बातों में इतने खो गए थे की समय का पता ही नहीं चला। दोपहर के एक बजने वाले थे। इसीलिए मैंने और अवन्ति से दोस्तों से विदा लिया और तेज क़दमों से घर की तरफ निकल पड़े। अवन्ति के घर का मुख्य दरवाजा मेरे घर से ठीक पहले पड़ता है तो मैंने फिर शाम को मिलने का वादा किया और घर आ गया।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ७ – नवमी)

शाम के लगभग ६ बजे थे जब माँ ने आकर जगाया। छुट्टी में दोपहर की नींद इतनी कस के आती है, की मजा ही आ जाता है। कोई न उठाये तो सीधे राते के खाने तक सोने की इच्छा रहती है। मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही थी, पर माँ ने आकर जगा दिया।

“दुर्गा पूजा घूमने नहीं चलना है क्या? जल्दी उठ। सब तैयार हो गए हैं।”

“हाँ माँ, घूमने तो चलना है। बस थोड़ी देर और सोने दे।”

“ठीक है तो फिर तू सो जा, हमलोग घूम कर आते है।”

“अरे माँ, तू तो बुरा मान गयी। चल ये ले, मैं उठ गया।”

उठकर जल्दी जल्दी आँखों में पानी मारी और नए कपड़े पहन के तैयार हो गया। बाहर आया तो देखा सब मेरा ही इन्तेजार कर रहे हैं। आज पूरा परिवार एक साथ दुर्गा पूजा घूमने जा रहा था। माँ, पापा, भाई और मैं – मेरा छोटा पर सुखी परिवार।चूँकि हमारे घर से लेकर सड़क तक जो गली है, उसमे रोशनी की कोई वव्यवस्था नहीं है। हम दोनों भाइयों के हाथ में एक एक टॉर्च पकड़ा दिया गया था। छोटा भाई और पापा आगे आगे, मैं और माँ पीछे से निकल पड़े, दुर्गा पूजा घूमने के लिए।

४ पूजा पंडाल घूमने के बाद हम सभी एक ठेले के सामने खड़े हुए और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण काम – ‘खाना’ शुरू किया हमने। सबसे पहले हमारे हाथ में आया फुचका, बड़ा आनंद आता है खाने में। फिर तो लाइन लग गयी, इस ठेले से उस ठेला बस घूम ही रहे थे। जब हमारा मुँह चलना बंद हुआ तबतक हमने सिर्फ फुचका, चाउमीन, मोमो, समोसा, जलेबी, मिस्टी दोई और पूजा का प्रसाद – खिचड़ी ही खाया था। अभी और भी कुछ चीजें बची थी, पर मौसम का मिजाज देखकर पापा ने कहा –

“चलो आज के लिए इतना काफी है, बाकी कल घूम लेना। बारिश आ गयी तो भागम भाग मच जाएगी।”

मन तो नहीं था पर पापा की बात सही थी और १० भी बजने वाला था। हमलोग घर की तरफ निकल पड़े।

मैंने पूजा घूमने के दौरान कहीं भी अवन्ति को नहीं देखा, बड़ा मन कर रहा था की उससे अगर बात हो जाती। जब रहा नहीं गया तो मैंने माँ से पूछा –

“आज बगल वाली आंटी लोग नहीं दिखाई दी, घर पे भी ताला लगा हुआ था और यहाँ बाजार में नहीं दिखाई दिए।”

“हाँ, वो लोग आज गाडी रिज़र्व कर के सिलीगुड़ी की पूजा घूमने गए है।”

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ६ – माँ दुर्गा)

बस स्टैंड पर हमें ज्यादा इन्तेजार नहीं करना पड़ा। घड़ी की घंटे वाली सुई ११ बजे के आस पास थी और मेटेली की बस समय पर आ गयी थी। चूँकि अभी तक सारे काम काजी लोग अपने अपने ऑफिस पहुँच चुके थे और स्कूली बच्चे भी अपने स्कूल पहुँच पढ़ाई में लगे होंगे, इसीलिए बस काफी खाली थी। हम दोनों ने दरवाजे की तरफ वाली कतार में दूसरी नंबर की सीट पर बैठने का फैसला किया और जैसा की हर लड़की करती है, अवन्ति ने खिड़की वाली सीट हड़प ली।

उसने अपनी कुहनी खिड़की पर टिकाई और आँखों के सामने लटकती लटों को ऊँगली में फंसा बाहर की तरफ देखने लगी और मैं…..?

मैं अवन्ति को देख रहा था। फिर से……

बस के खुलने के थोड़ी देर बाद मैंने ही चुप्पी तोड़ी।

“अवन्ति”

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। उसके सुन्दर चेहरे पर पड़ती धुप की किरणे उसे और सुन्दर बना रही थी। दो पल के लिए मैं तो भूल ही गया था की मुझे कुछ कहना है। अवन्ति ने अपनी भौहें चमका कर पूछा की क्या बात है। मैं झेंप सा गया तब। लेकिन तुरंत ही मैंने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर के कहा –

“तुम्हे लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासाएँ है। अगर तुम्हे सही लगे हो तो मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना है। हाँ, और एक बात, मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ। शांति से सुनने में माहिर। ” – माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने की कोशिश थी।

अवन्ति के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान चली आयी थी लेकिन उसकी आँखें साफ़ बता रही थी की वो कुछ सोच रही है। मुझे भी एहसास हुआ की मैंने पूछने में बहुत जल्दी कर दी, ऐसा कौन होगा जो दो दिन की मुलाकात में अपनी सारी बातें किसी को बता देगा।

“अगर तुम्हे बताने में हिचकिचाहट महसूस हो रही है तो अभी रहने दो, फिर कभी बताना।”

“नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो बस ये सोच रही थी की शायद ये जगह सही नहीं है। मेरी कहानी थोड़ी लम्बी है, समय लग जाएगा।”

“अच्छा तो ये बात है, ठीक है। मुझे इंतजार रहेगा अपनी अगली मुलाकात का।”

हमारी बस चालसा पहुँच गयी थी। कुछ लोग उतरे, ढेर सारे लोग चढ़े और बस फिर घुमावदार रास्तों से होती हुयी मेटेली की तरफ निकल पड़ी। चूँकि मुझे चुप रहना अच्छा लगता है पर ना जाने क्यूँ, अवन्ति से बातें करने का मन कर रहा था। मैंने फिर अयान और पीहू की बात छेड़ दी। मेटेली पहुँचने तक हम दोनों उन्ही की चर्चा में लगे हुए थे।

माँ दुर्गा बस ने हमें पौने बारह बजे तक मेटेली पंहुचा दिया और १२ बजे तक हमलोग अपने अपने घरों में थे।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ५ – अयान बैनर्जी)

मालबाजार के बस स्टैंड से बीएसएनएल के कार्यालय की दुरी कोई ज्यादा नहीं थी इसीलिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। मालबाजार की सड़क पर चलते हुए कई पुरानी यादें ताजा हो गयी और वो पुराना समय फिर से आँखों के सामने घूम गया।

“अचानक मुझे अभी याद आया की मैंने अपना परिचय तो दिया ही नहीं। अगर आप ये सोच रहे हैं की “देव” मेरे घर का नाम है और मेरा स्कूल-कॉलेज वाला नाम “अयान बैनर्जी” है तो आप बिलकुल गलत सोच रहे हैं।

“देवांश रॉय” – ये हूँ मैं।

मेरे दोस्तों ने मेरे नाम को काट छांट कर मुझे “देव” बना दिया। आजकल अक्सर ऐसा ही होता है, किसी का पूरा नाम लेने में मानो जबान साथ ही नहीं देती। लोग अपनी सुविधा के हिसाब से आपका नामकरण करते हैं। पुरे जीवन चक्र में आपका नामकरण लगभग तीन बार होना तो तय है – पहली बार माँ बाप आपका नाम रखेंगे, जिसमे उनकी मर्जी कम और पण्डित जी की मर्जी ज्यादा होती है। दूसरी बार आपके दोस्तों द्वारा आपका नामकरण फिर से किया जाएगा और आखिरी बार आपका नामकरण करेंगी आपकी धर्मपत्नी। पहले दोनों नाम आपको पसंद आये या ना आये पर पत्नी द्वारा रखे हुए नाम पर आप जान छिड़केंगे।

“मेटेली” नाम के एक छोटे से गाँव में पैदा होकर, उसी की गलियों में खेल कूद कर बड़ा हुआ। मेरी प्राथमिक शिक्षा मेटेली से ही हुयी और उच्च विद्यालय की पढाई के लिए मैं रोज मालबाजार जाया करता था। आदर्श उच्च विद्यालय – मेरे स्कूल का नाम था। अपने बचपन से लेकर जवानी तक का सफर मैंने इसी स्कूल में पूरा किया। बारहवीं के बाद मैंने सूर्यसेन कॉलेज, सिलीगुड़ी में अर्जी दी थी और मुझे वहां प्रवेश भी मिल गया। मुझे विज्ञान में कोई ज्यादा रूचि थी नहीं तो मैंने कॉमर्स को चुना अपने अच्छे भविष्य के लिए। फिलहाल मैं द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। “

मैं अपनी ही धुन में चला जा रहा था की पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा, पलट कर देखा तो मेरा दोस्त “अयान बैनर्जी” खड़ा था। अयान के पापा मालबाजार में नौकरी करते थे और उनका अपना मकान भी मालबाजार में ही था। हम दोनों ने पांचवी से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई साथ में की थी। हमेशा साथ साथ रहने वाले दोस्तों में से थे हम। बाकी बच्चे हमारी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। उसे देखते ही मैं ना जाने किन खयालों में खो गया था, शायद स्कूल की यादों ने घेर लिया था। मुझे अचंभित देखकर मेरे कंधे को जोर से झकझोरते हुए अयान से कहा –

“देव भाई, किन खयालों में खो गए?”

“अरे नहीं भाई, बस थोड़ा चौंक गया था। तुमसे ऐसे मिलने की तो कोई उम्मीद ही नहीं थी।” – मैंने होश में आते हुए जवाब दिया।

“उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी की तुम ऐसे मिलोगे, चलो आज मिल ही गए हो तो आओ मेरे साथ। तुमसे किसी को मिलाना है।” – अयान ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर ले जाने लगा।

“भाई रुक जा, पहले मुझे मेरा काम कर लेने दे। फिर तू जहाँ बोलेगा, मैं चलूँगा।” – बड़ी मुश्किल से मैंने अपना हाथ छुड़ाया।

अयान ने कुछ सोचा, फ़ोन कर किसी को थोड़ी देर बाद मिलने की बात कर के उसने कहा –

“वही मैं सोचु, तू बिना काम के तो कहीं आ जा नहीं सकता। चल फिर, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ। मेरे पास बाइक है, तेरा काम जल्दी भी हो जाएगा।” – इतना कह कर अयान बाइक लाने चला गया।

बुलेट की सवारी एक अलग ही आनंद की बात है। अयान को जन्मदिन के तोहफे में पापा से मिली थी। हम दोनों साथ में बीएसएनएल ऑफिस पहुंचे और मेरा काम जल्दी ही हो गया। मेरा काम हो जाने के बाद मैं अयान को ढूंढ रहा था पर वो लड़का कहीं गायब ही हो गया था। पांच मिनट बाद देखा तो अयान फ़ोन पर किसी से बात करते करते मेरी तरफ आ रहा था। शायद किसी से माफ़ी मांग रहा था और कह रहा था की बस पहुंच ही रहा हूँ।

“तेरा काम इतनी जल्दी हो गया” – अयान ने फ़ोन काट दिया था।

“हाँ भाई, जिस अफसर से काम था। वो आज ऑफिस में ही बैठा मिल गया।”

“अच्छा” – अयान के चेहरे पर ख़ुशी थी, की काम जल्दी ही निपट गया।

“अब चल तुझे जहां भी जाना है। पर एक शर्त है, तू जहां भी ले जा मुझे, लेकिन बस स्टैंड ही छोड़ना होगा।” – मैं थोड़ा गंभीर चेहरा बनाने की नाकाम कोशिश में लगा था।

“ऐसी नौबत ही नहीं आएगी मेरे भाई। मैं जिससे तुझे मिला रहा हूँ, वो बस स्टैंड में ही है। चल अब देर ना कर।” अयान ने बाइक स्टार्ट भी कर लिया था।

हमलोग बस स्टैंड पहुंचे ही थे की अयान ने मुझे आगे की तरफ देखने का इशारा किया और मुझे एक लड़की दिखाई दी। ठीक बस स्टैंड से लगे एक पीपल पेड़ के निचे खड़ी थी। उस लड़की ने हमें आते हुए नहीं देखा था, वो हमारे तरफ पीठ कर के
खड़ी थी। उस लड़की के कपड़ों से मुझे ऐसा लग रहा था की ये कहीं अवन्ति तो नहीं। अवन्ति का ख्याल आते ही मेरे मन को ढेर सारे सवालों और खयालों ने घेर लिया। थोड़ी ही देर में मन बेचैन हो उठा।

हम दोनों बाइक से उतरे ही थे की अयान ने मुझे वहीँ रुकने का इशारा किया और खुद आगे जाकर उस लड़की से बातें करने लगा। बातें करते करते अयान ने उस लड़की को मेरी तरफ दिखाया और वही हुआ जो मैं सपने में भी नहीं देखना चाहता था।
पीपल पेड़ के निचे खड़ी वो लड़की अवन्ति ही थी। कुछ ही सेकंड्स में मैंने नजाने क्या क्या सोच लिया। बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।

“अवन्ति……. अयान……. ये दोनों…..”

मैं ये सब सोच ही रहा था, की तब तक दोनों मेरे नजदीक आ गए थे।

“तुम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते हो! अवन्ति ने मुझे अभी अभी बताया। सही में भाई, दुनिया बहुत छोटी है। – अयान ने मुझसे पूछा।

“हाँ, बस कुछ दिनों से जानता हूँ। ये मेरे पड़ोस में रहती है।” – मैं मायूस नजरों से अवन्ति की तरफ देख रहा था।

“अच्छा, तब तो ठीक है…. अच्छा सुन, माजरा ये है की मेरी गर्लफ्रेंड पीहू, अवन्ति की बहुत अच्छी सहेली है। ” – ये सुन कर मेरा सारा ध्यान अवन्ति से हट कर सीधा अयान की बातों पे आ गया था। मैं खुश जो हो गया था।

अयान ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा –
“पर पीहू के घर वाले बहुत सख्त हैं, इसीलिए अवन्ति की मदद से मैं पीहू से मिल पाता हूँ। आज मैंने और पीहू ने ही बुलाया था अवन्ति को, ताकि हम मिल सके।” – अयान की नज़रों से साफ़ दिख रहा था की वो अवन्ति की बहुत इज्जत करता है।

हम दोनो बातें कर रहे थे और अवन्ति बड़े ध्यान से हम दोनों को सुन रही थी। पर मेरी नजर किसी को ढूंढ रही थी। जब रहा न गया तो मैंने अयान से पूछ ही लिया –

” पीहू है कहाँ ? “

“वो पीपल के पीछे खड़ी है, तुमसे मिलने में शर्मा रही है। कोई बात नहीं, फिर कभी मिला दूंगा। अभी तुम लोग निकलो और मुझे मेरे पीहू के पास अकेला रहने दो। ” – ये कह कर अयान मुस्कुराते हुए अपने पीहू के पास चला गया।

अब बचे हम दोनों, मैं और अवन्ति। मैं कुछ सोच रहा था की अवन्ति ने मुझे टोका –

“आज तुमने यहाँ जो कुछ देखा और सुना, ये सब मेरे घरवालों को पता नहीं है और बाकी तुम मुझे समझदार लगते हो। “

मैं मुस्कुरा रहा था और ये सोच रहा था की अवन्ति से मिले मुझे एक दिन हुआ है, हमारी अब तक ढंग से कोई बात नहीं हुयी है और मैं इसको लेकर उदास और खुश भी होने लगा हूँ। ये मुझे क्या हो रहा है, मैं ठीक तो हूँ ना? अगले ही पल मैंने इन सब बातों को झटक दिया और अवन्ति की तरफ देख कर कहा –

“ये जो तुम कर रही हो अयान और पीहू के लिए, बहुत नेक काम कर रही हो। अगर कभी मेरी जरुरत हो तो बेझिझक कहना, मुझे भी प्यार करने वालों की मदद करके ख़ुशी मिलती है।”

अवन्ति ने मुस्कुरा कर सहमति में सर हिलाया।

मैंने भी जवाब में मुस्कुरा दिया और हाथों के इशारे से उस से विदा लेकर जा ही रहा था की आवाज आयी –
“अच्छा सुनो।”

“हाँ” – मैंने पलट कर कहा।

“कल शाम को जब हम मिले थे तुम्हारे घर पर तब तो तुम बहुत जल्दी में थे और सुबह बस में भी हमारी बात नहीं हो पाई। अभी भी तुम बस बाय बोलकर जा रहे हो। चलो न, कहीं बैठ कर बातें करते हैं। वैसे भी बस के आने में अभी देर है।” – कहकर अवन्ति बस स्टॉप पर लगे बेंच की तरफ बढ़ गयी।

मैं भी पीछे से जाकर उसके बगल में बैठ गया और अवन्ति की तरफ देख कर थोड़ा मुस्कुरा दिया।

“मैंने कह तो दिया की बातें करेंगे पर शुरुआत कहाँ से करूँ ये समझ में नहीं आ रहा।” – ये कहते हुए अवन्ति हंस तो रही थी पर उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे। जो देखते ही देखते ख़ुशी में बदल गए।

“अवंतिका रॉयचौधुरी, मेरा पूरा नाम अवंतिका रॉयचौधुरी है, पर प्यार से सब मुझे अवन्ति बुलाते हैं।”

“देवांश रॉय, मेरा पूरा नाम देवांश रॉय है, पर प्यार से सब मुझे देव बुलाते हैं।”

इस तरीके की परिचय के बाद हम दोनों काफी देर तक हंस रहे थे। फिलहाल मुझे समझ में नहीं आ रहा था की क्या बात करूँ। मैं बस अवन्ति की बातें सुन रहा था और मन ही मन अयान बैनर्जी को धन्यवाद बोल रहा था, पीहू के बजाए अवन्ति से यूँ मिलाने के लिए।

 

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ४ – बस)

आज का दिन बड़ा सुहाना था, अभी सुबह के ८ बजे थे और हलकी हलकी धुप निकली हुयी थी। मैं आज मालबाजार जा रहा था, इंटरनेट कनेक्शन की अर्जी देने के लिए। बस स्टॉप पर मेरे साथ और ४ लोग खड़े थे और बस के आने का इन्तेजार हो रहा था। बस का समय वैसे ८ बजे ही है, पर वो बस अक्सर १०-१५ मिनट लेट ही आती है।

ठीक ८ बजकर १० मिनट पर मुझे बस की सीटी सुनाई दी, नजर उठाकर देखा तो बस आ रही थी, पर बस में लदे लोगों की भीड़ ने मन बेचैन कर दिया। चूँकि अगली बस एक घंटे बाद की थी, मैंने भी उसी बस में जाने का मन बना लिया और बस में चढ़ने की लाइन में जाकर खड़ा हो गया। बस अब हमारे स्टॉप पर पहुँचने ही वाली थी की मुझे किसी के पुकारने की आवाज सुनाई दी। मुड़कर देखा तो अवन्ति दौड़ी चली आ रही थी, मेरा नाम लेते लेते हाथों से कुछ इशारा कर रही थी। वो इशारा बस को थोड़ी देर और रुकवाने का था, जिसका अंदाजा मैंने उसे दौड़ते देख कर ही लगा लिया था। बस आयी, बड़ी मुसक्कत कर के मैं बस में चढ़ा और कंडक्टर से बात कर के अवन्ति को भी बस में चढ़वाया।

अवन्ति किसी तरह बस में चढ़ तो गयी पर लोगों की भीड़ में दबी कुचली सी लाचार खड़ी थी। मैं उससे थोड़ी दूर खड़ा था। जब मेरी नजर उसकी तरफ गयी तो उसने दबी जबान में मुझे धन्यवाद कहा। मैंने भी मुस्कुरा कर उसका जवाब दिया।

अभी बस एक किलोमीटर के लगभग चली होगी की एक भलेमानुष ने अपनी सीट छोड़कर अवन्ति को बैठने के लिए कहा और मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। अवन्ति ने उसका आभार व्यक्त किया और जाकर उसकी सीट पर बैठ गयी।

मेरे गाँव से मालबाजार की दुरी कुल १५ किलोमीटर है। बीच में एक जगह आती है – चालसा।

अवन्ति के बगल में जो लड़का बैठा था, उसे चालसा में ही उतरना था। वो लड़का जब चालसा के बस स्टॉप पर उतरने लगा तो अवन्ति ने मेरी तरफ देख कर इशारा किया की मैं उसके बगल में आकर बैठ जाऊं। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था। मैं अभी भी वो सुबह वाली घटना याद कर कर के और ये सोच कर परेशान हो रहा था की बगल में बैठने पर पता नहीं क्या पूछेगी? कहीं ये पूछ लिया की तुम मुझे क्यूँ घूर रहे थे? मैं इन्ही उधेड़बुन में फंसा हुआ था की कोई और आकर अवन्ति के बगल में बैठ गया, और अवन्ति उसे मना भी नहीं कर पाई। वो लड़का कोई और नहीं, वही था, जिसने अपनी सीट अवन्ति को दी थी। अवन्ति ने फिर बड़ी लाचार नजरों से मेरी तरफ देखा और मैंने उसे इशारों में समझा दिया की मैं ऐसे ही ठीक हूँ।

कुछ ही देर में हमारी बस मालबाजार पहुच गयी और हम दोनों एक दूसरे को बाय बोलकर अपने अपने काम के लिए अलग अलग रास्ते पे निकल पड़े।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ३ – रसोई)

दोपहर को माँ के हाथ का बना खाना कुछ ज्यादा ही खा लिया मैंने। करता भी क्या? इतना स्वादिष्ट जो बना था। इतना ज्यादा खाना खा लेने के बाद जो जम के नींद आयी, मैं सीधे शाम को उठा। वो भी मम्मी की आवाज सुन कर, उन्हें कुछ सामान मंगवाने थे बाजार से। आज महाअष्टमी के अवसर पर कुछ ख़ास बनने वाला था रात के खाने में।

शाम ढले जब मैं बाजार से घर की खरीदारी कर के वापस आया तो आवाजें सुन कर लगा की घर में मेहमान आये हुए हैं। मैं फिर बैठक में ना जाकर सीधे रसोई में चला गया। रसोई में मेरी माँ किसी लड़की के साथ खड़ी होकर चाय बना रही थी। वो लड़की और कोई नहीं, वही सुबह वाली लड़की थी।

मुझे देखते ही दोनों चुप हो गए, मैंने माँ को झोला थमाया और बाहर जा ही रहा था की..

“देव” – माँ ने मुझे पुकारा।

मैंने रुक कर जब माँ की तरफ देखा तो वो मुझे अपने पास बुला रही थी। जब मैं माँ के पास पहुँचा तो माँ ने उस लड़की से मेरा परिचय करवाया। माँ ने बताया की इसका नाम अवन्ति है, कुछ महीने पहले ही हमारे पड़ोस में रहने आयी है।

“हेल्लो देव” – अवन्ति के पहले शब्द जो मेरे कानो में पड़े, मिसरी घोल गए।
“हाय अवन्ति” – मुस्कुरा कर मैंने भी जवाब दिया।

मुझे अब भी उससे नजरें मिलाने में थोड़ा अजीब लग रहा था। सुबह सुबह की याद अभी ताजा था। चूँकि मुझे बाहर पूजा घूमने की अनुमति माँ से मिल गयी थी, इसीलिए अवन्ति को बाय कहकर मैं तैयार होने में लग गया।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य २ – कालीबाड़ी)

कमरे में आये हुए मुझे थोड़ी देर ही हुयी थी की माँ ने आवाज लगाईं –

“जल्दी से तैयार हो जा, कालीबाड़ी चलना है महाअष्टमी का भोग चढाने के लिए।”

मैं भी झटपट तैयार होकर बैठ गया माँ के तैयार होने के इन्तेजार में। जब माँ तैयार होकर आयीं तो उनके हाथ में भोग की थाली थी, जो मैंने तुरंत उनके हाथों से ले लिया और दोनों माँ बेटे पैदल निकल पड़े कालीबाड़ी की तरफ।

कालीबाड़ी में काफी चहल पहल थी। कहीं ढाक बजाया जा रहा था तो कहीं लाउड स्पीकर पर माँ दुर्गा की आरती बज रही थी। इन सब के बीच औरतोँ की अड्डेबाजी जारी थी। हम दोनों ने पहले जाकर माँ दुर्गा को प्रणाम किया और अपनी ढेर सारी मांगें रख दी उनके सामने। वहीँ सामने भोग देने वालों के लिए टेबल लगाया गया था जहाँ दो लोग बैठे नाम लिख रहे थे। नाम लिखाने की लाइन में मैंने उस लड़की को भी खड़े देखा। शायद अपने माँ के साथ आयी होगी, मैंने मन ही मन सोचा। चूँकि मैं उसकी नज़रों के सामने नहीं आना चाहता था सो मैंने जल्दी जल्दी अपना नाम लिखवा कर थाली जमा करवा दी जो अब पूजा के बाद मिलने वाली थी।

“माँ, आप तो औरतों के साथ व्यस्त हो जाओगी, मैं पूजा के ख़तम होने तक क्या करूँगा यहाँ ? मैं एक काम करता हूँ, अभी घर चला जाता हूँ और पूजा के बाद मैं आपको लेने के लिए चला आऊंगा।” – मैं जल्दी से जल्दी कालीबाड़ी से निकलना चाहता था।

“अच्छा, ठीक है। तू घर चला जा, मेरी चिंता मत करना। मैं बगल वाली नयी आंटी के साथ घर वापस आ जाउंगी।”

मैंने भी सहमति में सर हिलाया और घर आ गया।