अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ७ – नवमी)

शाम के लगभग ६ बजे थे जब माँ ने आकर जगाया। छुट्टी में दोपहर की नींद इतनी कस के आती है, की मजा ही आ जाता है। कोई न उठाये तो सीधे राते के खाने तक सोने की इच्छा रहती है। मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही थी, पर माँ ने आकर जगा दिया।

“दुर्गा पूजा घूमने नहीं चलना है क्या? जल्दी उठ। सब तैयार हो गए हैं।”

“हाँ माँ, घूमने तो चलना है। बस थोड़ी देर और सोने दे।”

“ठीक है तो फिर तू सो जा, हमलोग घूम कर आते है।”

“अरे माँ, तू तो बुरा मान गयी। चल ये ले, मैं उठ गया।”

उठकर जल्दी जल्दी आँखों में पानी मारी और नए कपड़े पहन के तैयार हो गया। बाहर आया तो देखा सब मेरा ही इन्तेजार कर रहे हैं। आज पूरा परिवार एक साथ दुर्गा पूजा घूमने जा रहा था। माँ, पापा, भाई और मैं – मेरा छोटा पर सुखी परिवार।चूँकि हमारे घर से लेकर सड़क तक जो गली है, उसमे रोशनी की कोई वव्यवस्था नहीं है। हम दोनों भाइयों के हाथ में एक एक टॉर्च पकड़ा दिया गया था। छोटा भाई और पापा आगे आगे, मैं और माँ पीछे से निकल पड़े, दुर्गा पूजा घूमने के लिए।

४ पूजा पंडाल घूमने के बाद हम सभी एक ठेले के सामने खड़े हुए और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण काम – ‘खाना’ शुरू किया हमने। सबसे पहले हमारे हाथ में आया फुचका, बड़ा आनंद आता है खाने में। फिर तो लाइन लग गयी, इस ठेले से उस ठेला बस घूम ही रहे थे। जब हमारा मुँह चलना बंद हुआ तबतक हमने सिर्फ फुचका, चाउमीन, मोमो, समोसा, जलेबी, मिस्टी दोई और पूजा का प्रसाद – खिचड़ी ही खाया था। अभी और भी कुछ चीजें बची थी, पर मौसम का मिजाज देखकर पापा ने कहा –

“चलो आज के लिए इतना काफी है, बाकी कल घूम लेना। बारिश आ गयी तो भागम भाग मच जाएगी।”

मन तो नहीं था पर पापा की बात सही थी और १० भी बजने वाला था। हमलोग घर की तरफ निकल पड़े।

मैंने पूजा घूमने के दौरान कहीं भी अवन्ति को नहीं देखा, बड़ा मन कर रहा था की उससे अगर बात हो जाती। जब रहा नहीं गया तो मैंने माँ से पूछा –

“आज बगल वाली आंटी लोग नहीं दिखाई दी, घर पे भी ताला लगा हुआ था और यहाँ बाजार में नहीं दिखाई दिए।”

“हाँ, वो लोग आज गाडी रिज़र्व कर के सिलीगुड़ी की पूजा घूमने गए है।”

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ६ – माँ दुर्गा)

बस स्टैंड पर हमें ज्यादा इन्तेजार नहीं करना पड़ा। घड़ी की घंटे वाली सुई ११ बजे के आस पास थी और मेटेली की बस समय पर आ गयी थी। चूँकि अभी तक सारे काम काजी लोग अपने अपने ऑफिस पहुँच चुके थे और स्कूली बच्चे भी अपने स्कूल पहुँच पढ़ाई में लगे होंगे, इसीलिए बस काफी खाली थी। हम दोनों ने दरवाजे की तरफ वाली कतार में दूसरी नंबर की सीट पर बैठने का फैसला किया और जैसा की हर लड़की करती है, अवन्ति ने खिड़की वाली सीट हड़प ली।

उसने अपनी कुहनी खिड़की पर टिकाई और आँखों के सामने लटकती लटों को ऊँगली में फंसा बाहर की तरफ देखने लगी और मैं…..?

मैं अवन्ति को देख रहा था। फिर से……

बस के खुलने के थोड़ी देर बाद मैंने ही चुप्पी तोड़ी।

“अवन्ति”

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। उसके सुन्दर चेहरे पर पड़ती धुप की किरणे उसे और सुन्दर बना रही थी। दो पल के लिए मैं तो भूल ही गया था की मुझे कुछ कहना है। अवन्ति ने अपनी भौहें चमका कर पूछा की क्या बात है। मैं झेंप सा गया तब। लेकिन तुरंत ही मैंने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर के कहा –

“तुम्हे लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासाएँ है। अगर तुम्हे सही लगे हो तो मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना है। हाँ, और एक बात, मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ। शांति से सुनने में माहिर। ” – माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने की कोशिश थी।

अवन्ति के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान चली आयी थी लेकिन उसकी आँखें साफ़ बता रही थी की वो कुछ सोच रही है। मुझे भी एहसास हुआ की मैंने पूछने में बहुत जल्दी कर दी, ऐसा कौन होगा जो दो दिन की मुलाकात में अपनी सारी बातें किसी को बता देगा।

“अगर तुम्हे बताने में हिचकिचाहट महसूस हो रही है तो अभी रहने दो, फिर कभी बताना।”

“नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो बस ये सोच रही थी की शायद ये जगह सही नहीं है। मेरी कहानी थोड़ी लम्बी है, समय लग जाएगा।”

“अच्छा तो ये बात है, ठीक है। मुझे इंतजार रहेगा अपनी अगली मुलाकात का।”

हमारी बस चालसा पहुँच गयी थी। कुछ लोग उतरे, ढेर सारे लोग चढ़े और बस फिर घुमावदार रास्तों से होती हुयी मेटेली की तरफ निकल पड़ी। चूँकि मुझे चुप रहना आता है नहीं, तो मैंने अयान और पीहू की बात छेड़ दी। मेटेली पहुँचने तक उन्ही की चर्चा में लगे हुए थे।

माँ दुर्गा बस ने हमें पौने बारह बजे तक मेटेली पंहुचा दिया और १२ बजे तक हमलोग अपने अपने घरों में थे।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ५ – अयान बैनर्जी)

मालबाजार के बस स्टैंड से बीएसएनएल के कार्यालय की दुरी कोई ज्यादा नहीं थी इसीलिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। मालबाजार की सड़क पर चलते हुए कई पुरानी यादें ताजा हो गयी और वो पुराना समय फिर से आँखों के सामने घूम गया।

“अचानक मुझे अभी याद आया की मैंने अपना परिचय तो दिया ही नहीं। अगर आप ये सोच रहे हैं की “देव” मेरे घर का नाम है और मेरा स्कूल-कॉलेज वाला नाम “अयान बैनर्जी” है तो आप बिलकुल गलत सोच रहे हैं।

“देवांश रॉय” – ये हूँ मैं।

मेरे दोस्तों ने मेरे नाम को काट छांट कर मुझे “देव” बना दिया। आजकल अक्सर ऐसा ही होता है, किसी का पूरा नाम लेने में मानो जबान साथ ही नहीं देती। लोग अपनी सुविधा के हिसाब से आपका नामकरण करते हैं। पुरे जीवन चक्र में आपका नामकरण लगभग तीन बार होना तो तय है – पहली बार माँ बाप आपका नाम रखेंगे, जिसमे उनकी मर्जी कम और पण्डित जी की मर्जी ज्यादा होती है। दूसरी बार आपके दोस्तों द्वारा आपका नामकरण फिर से किया जाएगा और आखिरी बार आपका नामकरण करेंगी आपकी धर्मपत्नी। पहले दोनों नाम आपको पसंद आये या ना आये पर पत्नी द्वारा रखे हुए नाम पर आप जान छिड़केंगे।

“मेटेली” नाम के एक छोटे से गाँव में पैदा होकर, उसी की गलियों में खेल कूद कर बड़ा हुआ। मेरी प्राथमिक शिक्षा मेटेली से ही हुयी और उच्च विद्यालय की पढाई के लिए मैं रोज मालबाजार जाया करता था। आदर्श उच्च विद्यालय – मेरे स्कूल का नाम था। अपने बचपन से लेकर जवानी तक का सफर मैंने इसी स्कूल में पूरा किया। बारहवीं के बाद मैंने सूर्यसेन कॉलेज, सिलीगुड़ी में अर्जी दी थी और मुझे वहां प्रवेश भी मिल गया। मुझे विज्ञान में कोई ज्यादा रूचि थी नहीं तो मैंने कॉमर्स को चुना अपने अच्छे भविष्य के लिए। फिलहाल मैं द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। “

मैं अपनी ही धुन में चला जा रहा था की पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा, पलट कर देखा तो मेरा दोस्त “अयान बैनर्जी” खड़ा था। अयान के पापा मालबाजार में नौकरी करते थे और उनका अपना मकान भी मालबाजार में ही था। हम दोनों ने पांचवी से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई साथ में की थी। हमेशा साथ साथ रहने वाले दोस्तों में से थे हम। बाकी बच्चे हमारी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। उसे देखते ही मैं ना जाने किन खयालों में खो गया था, शायद स्कूल की यादों ने घेर लिया था। मुझे अचंभित देखकर मेरे कंधे को जोर से झकझोरते हुए अयान से कहा –

“देव भाई, किन खयालों में खो गए?”

“अरे नहीं भाई, बस थोड़ा चौंक गया था। तुमसे ऐसे मिलने की तो कोई उम्मीद ही नहीं थी।” – मैंने होश में आते हुए जवाब दिया।

“उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी की तुम ऐसे मिलोगे, चलो आज मिल ही गए हो तो आओ मेरे साथ। तुमसे किसी को मिलाना है।” – अयान ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर ले जाने लगा।

“भाई रुक जा, पहले मुझे मेरा काम कर लेने दे। फिर तू जहाँ बोलेगा, मैं चलूँगा।” – बड़ी मुश्किल से मैंने अपना हाथ छुड़ाया।

अयान ने कुछ सोचा, फ़ोन कर किसी को थोड़ी देर बाद मिलने की बात कर के उसने कहा –

“वही मैं सोचु, तू बिना काम के तो कहीं आ जा नहीं सकता। चल फिर, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ। मेरे पास बाइक है, तेरा काम जल्दी भी हो जाएगा।” – इतना कह कर अयान बाइक लाने चला गया।

बुलेट की सवारी एक अलग ही आनंद की बात है। अयान को जन्मदिन के तोहफे में पापा से मिली थी। हम दोनों साथ में बीएसएनएल ऑफिस पहुंचे और मेरा काम जल्दी ही हो गया। मेरा काम हो जाने के बाद मैं अयान को ढूंढ रहा था पर वो लड़का कहीं गायब ही हो गया था। पांच मिनट बाद देखा तो अयान फ़ोन पर किसी से बात करते करते मेरी तरफ आ रहा था। शायद किसी से माफ़ी मांग रहा था और कह रहा था की बस पहुंच ही रहा हूँ।

“तेरा काम इतनी जल्दी हो गया” – अयान ने फ़ोन काट दिया था।

“हाँ भाई, जिस अफसर से काम था। वो आज ऑफिस में ही बैठा मिल गया।”

“अच्छा” – अयान के चेहरे पर ख़ुशी थी, की काम जल्दी ही निपट गया।

“अब चल तुझे जहां भी जाना है। पर एक शर्त है, तू जहां भी ले जा मुझे, लेकिन बस स्टैंड ही छोड़ना होगा।” – मैं थोड़ा गंभीर चेहरा बनाने की नाकाम कोशिश में लगा था।

“ऐसी नौबत ही नहीं आएगी मेरे भाई। मैं जिससे तुझे मिला रहा हूँ, वो बस स्टैंड में ही है। चल अब देर ना कर।” अयान ने बाइक स्टार्ट भी कर लिया था।

हमलोग बस स्टैंड पहुंचे ही थे की अयान ने मुझे आगे की तरफ देखने का इशारा किया और मुझे एक लड़की दिखाई दी। ठीक बस स्टैंड से लगे एक पीपल पेड़ के निचे खड़ी थी। उस लड़की ने हमें आते हुए नहीं देखा था, वो हमारे तरफ पीठ कर के
खड़ी थी। उस लड़की के कपड़ों से मुझे ऐसा लग रहा था की ये कहीं अवन्ति तो नहीं। अवन्ति का ख्याल आते ही मेरे मन को ढेर सारे सवालों और खयालों ने घेर लिया। थोड़ी ही देर में मन बेचैन हो उठा।

हम दोनों बाइक से उतरे ही थे की अयान ने मुझे वहीँ रुकने का इशारा किया और खुद आगे जाकर उस लड़की से बातें करने लगा। बातें करते करते अयान ने उस लड़की को मेरी तरफ दिखाया और वही हुआ जो मैं सपने में भी नहीं देखना चाहता था।
पीपल पेड़ के निचे खड़ी वो लड़की अवन्ति ही थी। कुछ ही सेकंड्स में मैंने नजाने क्या क्या सोच लिया। बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।

“अवन्ति……. अयान……. ये दोनों…..”

मैं ये सब सोच ही रहा था, की तब तक दोनों मेरे नजदीक आ गए थे।

“तुम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते हो! अवन्ति ने मुझे अभी अभी बताया। सही में भाई, दुनिया बहुत छोटी है। – अयान ने मुझसे पूछा।

“हाँ, बस कुछ दिनों से जानता हूँ। ये मेरे पड़ोस में रहती है।” – मैं मायूस नजरों से अवन्ति की तरफ देख रहा था।

“अच्छा, तब तो ठीक है…. अच्छा सुन, माजरा ये है की मेरी गर्लफ्रेंड पीहू, अवन्ति की बहुत अच्छी सहेली है। ” – ये सुन कर मेरा सारा ध्यान अवन्ति से हट कर सीधा अयान की बातों पे आ गया था। मैं खुश जो हो गया था।

अयान ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा –
“पर पीहू के घर वाले बहुत सख्त हैं, इसीलिए अवन्ति की मदद से मैं पीहू से मिल पाता हूँ। आज मैंने और पीहू ने ही बुलाया था अवन्ति को, ताकि हम मिल सके।” – अयान की नज़रों से साफ़ दिख रहा था की वो अवन्ति की बहुत इज्जत करता है।

हम दोनो बातें कर रहे थे और अवन्ति बड़े ध्यान से हम दोनों को सुन रही थी। पर मेरी नजर किसी को ढूंढ रही थी। जब रहा न गया तो मैंने अयान से पूछ ही लिया –

” पीहू है कहाँ ? “

“वो पीपल के पीछे खड़ी है, तुमसे मिलने में शर्मा रही है। कोई बात नहीं, फिर कभी मिला दूंगा। अभी तुम लोग निकलो और मुझे मेरे पीहू के पास अकेला रहने दो। ” – ये कह कर अयान मुस्कुराते हुए अपने पीहू के पास चला गया।

अब बचे हम दोनों, मैं और अवन्ति। मैं कुछ सोच रहा था की अवन्ति ने मुझे टोका –

“आज तुमने यहाँ जो कुछ देखा और सुना, ये सब मेरे घरवालों को पता नहीं है और बाकी तुम मुझे समझदार लगते हो। ” – इतना कहकर वो बस स्टैंड में बनी बेंच पर जाकर बैठ गयी।

मैं ये सोच रहा था की अवन्ति से मिले मुझे एक दिन हुआ है, हमारी अब तक ढंग से कोई बात नहीं हुयी है और मैं इसको लेकर उदास और खुश भी होने लगा हूँ। ये मुझे क्या हो रहा है, मैं ठीक तो हूँ ना? अगले ही पल मैंने इन सब बातों को झटक दिया और अवन्ति के बगल में जाकर बैठ गया। बैठते ही मैंने अवन्ति की तरफ देखा कर कहा –

“ये जो तुम कर रही हो अयान और पीहू के लिए, बहुत नेक काम कर रही हो। अगर कभी मेरी जरुरत हो तो बेझिझक कहना, मुझे भी प्यार करने वालों की मदद करके ख़ुशी मिलती है।”

अवन्ति ने मुस्कुरा कर सहमति में सर हिलाया।

“कल तो तुम बहुत जल्दी में थे, इसीलिए हमारी बात ठीक से नहीं हो पाई। चलो आज फिर से कोशिश करते है।” – कहकर अवन्ति ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“अवंतिका रॉयचौधुरी, मेरा पूरा नाम अवंतिका रॉयचौधुरी है, पर प्यार से सब मुझे अवन्ति बुलाते हैं।”

“देवांश रॉय, मेरा पूरा नाम देवांश रॉय है, पर प्यार से सब मुझे देव बुलाते हैं।”

इस तरीके की परिचय के बाद हम दोनों काफी देर तक हंस रहे थे। फिलहाल मुझे समझ में नहीं आ रहा था की और क्या बात करूँ। इसीलिए चुप बैठना ही सही लगा। मन ही मन मैं अयान बैनर्जी को धन्यवाद बोल रहा था, पीहू के बजाए अवन्ति से यूँ मिलाने के लिए।

 

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ४ – बस)

आज का दिन बड़ा सुहाना था, अभी सुबह के ८ बजे थे और हलकी हलकी धुप निकली हुयी थी। मैं आज मालबाजार जा रहा था, इंटरनेट कनेक्शन की अर्जी देने के लिए। बस स्टॉप पर मेरे साथ और ४ लोग खड़े थे और बस के आने का इन्तेजार हो रहा था। बस का समय वैसे ८ बजे ही है, पर वो बस अक्सर १०-१५ मिनट लेट ही आती है।

ठीक ८ बजकर १० मिनट पर मुझे बस की सीटी सुनाई दी, नजर उठाकर देखा तो बस आ रही थी, पर बस में लदे लोगों की भीड़ ने मन बेचैन कर दिया। चूँकि अगली बस एक घंटे बाद की थी, मैंने भी उसी बस में जाने का मन बना लिया और बस में चढ़ने की लाइन में जाकर खड़ा हो गया। बस अब हमारे स्टॉप पर पहुँचने ही वाली थी की मुझे किसी के पुकारने की आवाज सुनाई दी। मुड़कर देखा तो अवन्ति दौड़ी चली आ रही थी, मेरा नाम लेते लेते हाथों से कुछ इशारा कर रही थी। वो इशारा बस को थोड़ी देर और रुकवाने का था, जिसका अंदाजा मैंने उसे दौड़ते देख कर ही लगा लिया था। बस आयी, बड़ी मुसक्कत कर के मैं बस में चढ़ा और कंडक्टर से बात कर के अवन्ति को भी बस में चढ़वाया।

अवन्ति किसी तरह बस में चढ़ तो गयी पर लोगों की भीड़ में दबी कुचली सी लाचार खड़ी थी। मैं उससे थोड़ी दूर खड़ा था। जब मेरी नजर उसकी तरफ गयी तो उसने दबी जबान में मुझे धन्यवाद कहा। मैंने भी मुस्कुरा कर उसका जवाब दिया।

अभी बस एक किलोमीटर के लगभग चली होगी की एक भलेमानुष ने अपनी सीट छोड़कर अवन्ति को बैठने के लिए कहा और मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। अवन्ति ने उसका आभार व्यक्त किया और जाकर उसकी सीट पर बैठ गयी।

मेरे गाँव से मालबाजार की दुरी कुल १५ किलोमीटर है। बीच में एक जगह आती है – चालसा।

अवन्ति के बगल में जो लड़का बैठा था, उसे चालसा में ही उतरना था। वो लड़का जब चालसा के बस स्टॉप पर उतरने लगा तो अवन्ति ने मेरी तरफ देख कर इशारा किया की मैं उसके बगल में आकर बैठ जाऊं। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था। मैं अभी भी वो सुबह वाली घटना याद कर कर के और ये सोच कर परेशान हो रहा था की बगल में बैठने पर पता नहीं क्या पूछेगी? कहीं ये पूछ लिया की तुम मुझे क्यूँ घूर रहे थे? मैं इन्ही उधेड़बुन में फंसा हुआ था की कोई और आकर अवन्ति के बगल में बैठ गया, और अवन्ति उसे मना भी नहीं कर पाई। वो लड़का कोई और नहीं, वही था, जिसने अपनी सीट अवन्ति को दी थी। अवन्ति ने फिर बड़ी लाचार नजरों से मेरी तरफ देखा और मैंने उसे इशारों में समझा दिया की मैं ऐसे ही ठीक हूँ।

कुछ ही देर में हमारी बस मालबाजार पहुच गयी और हम दोनों एक दूसरे को बाय बोलकर अपने अपने काम के लिए अलग अलग रास्ते पे निकल पड़े।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ३ – रसोई)

दोपहर को माँ के हाथ का बना खाना कुछ ज्यादा ही खा लिया मैंने। करता भी क्या? इतना स्वादिष्ट जो बना था। इतना ज्यादा खाना खा लेने के बाद जो जम के नींद आयी, मैं सीधे शाम को उठा। वो भी मम्मी की आवाज सुन कर, उन्हें कुछ सामान मंगवाने थे बाजार से। आज महाअष्टमी के अवसर पर कुछ ख़ास बनने वाला था रात के खाने में।

शाम ढले जब मैं बाजार से घर की खरीदारी कर के वापस आया तो आवाजें सुन कर लगा की घर में मेहमान आये हुए हैं। मैं फिर बैठक में ना जाकर सीधे रसोई में चला गया। रसोई में मेरी माँ किसी लड़की के साथ खड़ी होकर चाय बना रही थी। वो लड़की और कोई नहीं, वही सुबह वाली लड़की थी।

मुझे देखते ही दोनों चुप हो गए, मैंने माँ को झोला थमाया और बाहर जा ही रहा था की..

“देव” – माँ ने मुझे पुकारा।

मैंने रुक कर जब माँ की तरफ देखा तो वो मुझे अपने पास बुला रही थी। जब मैं माँ के पास पहुँचा तो माँ ने उस लड़की से मेरा परिचय करवाया। माँ ने बताया की इसका नाम अवन्ति है, कुछ महीने पहले ही हमारे पड़ोस में रहने आयी है।

“हेल्लो देव” – अवन्ति के पहले शब्द जो मेरे कानो में पड़े, मिसरी घोल गए।
“हाय अवन्ति” – मुस्कुरा कर मैंने भी जवाब दिया।

मुझे अब भी उससे नजरें मिलाने में थोड़ा अजीब लग रहा था। सुबह सुबह की याद अभी ताजा था। चूँकि मुझे बाहर पूजा घूमने की अनुमति माँ से मिल गयी थी, इसीलिए अवन्ति को बाय कहकर मैं तैयार होने में लग गया।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य २ – कालीबाड़ी)

कमरे में आये हुए मुझे थोड़ी देर ही हुयी थी की माँ ने आवाज लगाईं –

“जल्दी से तैयार हो जा, कालीबाड़ी चलना है महाअष्टमी का भोग चढाने के लिए।”

मैं भी झटपट तैयार होकर बैठ गया माँ के तैयार होने के इन्तेजार में। जब माँ तैयार होकर आयीं तो उनके हाथ में भोग की थाली थी, जो मैंने तुरंत उनके हाथों से ले लिया और दोनों माँ बेटे पैदल निकल पड़े कालीबाड़ी की तरफ।

कालीबाड़ी में काफी चहल पहल थी। कहीं ढाक बजाया जा रहा था तो कहीं लाउड स्पीकर पर माँ दुर्गा की आरती बज रही थी। इन सब के बीच औरतोँ की अड्डेबाजी जारी थी। हम दोनों ने पहले जाकर माँ दुर्गा को प्रणाम किया और अपनी ढेर सारी मांगें रख दी उनके सामने। वहीँ सामने भोग देने वालों के लिए टेबल लगाया गया था जहाँ दो लोग बैठे नाम लिख रहे थे। नाम लिखाने की लाइन में मैंने उस लड़की को भी खड़े देखा। शायद अपने माँ के साथ आयी होगी, मैंने मन ही मन सोचा। चूँकि मैं उसकी नज़रों के सामने नहीं आना चाहता था सो मैंने जल्दी जल्दी अपना नाम लिखवा कर थाली जमा करवा दी जो अब पूजा के बाद मिलने वाली थी।

“माँ, आप तो औरतों के साथ व्यस्त हो जाओगी, मैं पूजा के ख़तम होने तक क्या करूँगा यहाँ ? मैं एक काम करता हूँ, अभी घर चला जाता हूँ और पूजा के बाद मैं आपको लेने के लिए चला आऊंगा।” – मैं जल्दी से जल्दी कालीबाड़ी से निकलना चाहता था।

“अच्छा, ठीक है। तू घर चला जा, मेरी चिंता मत करना। मैं बगल वाली नयी आंटी के साथ घर वापस आ जाउंगी।”

मैंने भी सहमति में सर हिलाया और घर आ गया।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य १ – बरामदा)

अक्टूबर का महीना था, ठंडी का मौसम अपना रंग दिखाने लगा था। सुबह और शाम को ठण्ड थोड़ी बढ़ जाती थी। दिन में थोड़ी बहुत धुप निकलती थी जिससे मौसम सुहाना लगता था। दुर्गा पूजा से ठीक पहले मेरी कॉलेज की छुट्टियाँ शुरू हो गयी थी। आज सप्तमी है, और मेरे शहर सिलीगुड़ी का मिजाज ही बदला हुआ है। दुर्गा पूजा के भव्य पंडालों ने शहर की शोभा में चार चाँद लगा दिए हैं। आज रात को इन पंडालों की शोभा कुछ और बढ़ाने के बाद मैं कल सुबह अपने गाँव मेटेली जा रहा हूँ, छुट्टियाँ बिताने।

अलार्म की आवाज से आँख खुली तो पता चला सुबह के ५ बज गए हैं, और मुझे ६ बजे की बस पकड़नी है। रात को घूमने के चक्कर में कुछ न हो पाया और अब १ घंटे में सब कुछ कर के बस भी पकड़नी है। आखिर में किसी तरह भाग भाग कर मैंने बस पकड़ ही ली। बस में बैठते ही बड़ी जोर की नींद आयी और सीधे मेटेली में मेरी आँखें खुली। थकावट इतनी ज्यादा थी की कंडक्टर के ३-४ बार उठाने के बाद मैं होश में आया।

बस से उतरते साथ मुझे याद आया की आज महाअष्टमी है, जिसे मैं मेटेली की हवा में महसूस कर पा रहा था। अगरबत्ती की खुशबु, धुप की सुगन्घ चारो तरफ फैली हुयी थी। मौसम एकदम बढ़िया था। सुबह हलकी ठंड और साफ़ थी। हलकी हलकी हवा चल रही थी जो मेरे गालों को हौले से सहला जाती थी। दुरी पर दो बड़े बड़े हरियाली से ढके पहाड़ साथ खड़े थे, मानो मेरी स्वागत की पूरी तैयारी थी।

माँ के आग्रह पर मैं अष्टमी को घर आया था, वो मुझे अपने साथ कालीबाड़ी ले जाना चाहती थी। क्यूंकि मेरे छोटे भाई ने कालीबाड़ी जाने से साफ़ साफ़ मना कर दिया था तो बचा सिर्फ मैं। मैंने इस बार की दुर्गा पूजा दोस्तों के साथ घूमने का प्लान बना रखा था और दशमी के बाद ही मेरा घर आने का विचार था। पर मैं पूरी दुनिया को मना कर सकता हूँ, माँ को नहीं। घर पहुँचते ही मैंने माँ और पापा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और चला गया नहाने। नहाकर आया तो देखा की गरमा गरम चाय तैयार है। चाय की प्याली लेकर मैं बरामदे में आकर बैठ गया। ठण्ड का मौसम और गरम चाय की चुस्की, आनंद ही कुछ और था। चाय की चुस्की लेते हुए मैं कुछ सोच रहा था की पायल की आवाज ने ध्यान तोड़ दिया। नजरें घुमाई तो देखा की पड़ोस के आँगन में एक लड़की भीगे कपड़ों को रस्सी पर टांग रही थी।

सफ़ेद चूड़ीदार और सांवला रंग। रंग सांवला होते हुए भी काफी हद तक गोरेपन की तरफ था। मैं तो बस उसे निहारता ही रह गया। खामोश जादूमयी आँखें, लम्बी नाक, तराशे हुए होठ, चौड़ा ललाट,पीठ से निचे तक लटके हुए लम्बे बाल – जहाँ तक नजर गयी, वो खूबसूरत ही लगती गयी। कद लगभग ५ फुट ६ इंच के आस पास होगा, जो एक लड़की के हिसाब से काफी अच्छी लम्बाई है। इस लम्बाई पर पतली छरहर काया, मुझे उत्तेजित करने के लिए काफी थी। ये उत्तेजित करने वाली भावनाएं मुझे और बहकाने वाली थी की शायद उसे एहसास हो गया की कोई है जो उसे घूर रहा है। उसने बाल्टी से कपडे निकालते हुए तिरछी नजरों से मेरी तरफ देखा तो हमारी नजरें टकरा गयी और मैं घबरा के इधर उधर ताकने लगा और चुप चाप चोरों की तरह उठकर अपने कमरे में चला आया।

गलती मेरी नहीं थी, वो थी ही कुछ ऐसी। नजर तो बस उससे चिपक के रह गयी थी।

अवन्ति-एक प्रेम कहानी

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उसका नाम अवन्ति था, देखने में कोई ज्यादा खूबसूरत तो नहीं थी, पर अच्छे से तराशे हुए नैन नक्श, लम्बा छरहरा बदन अक्सर लोगों का ध्यान खींचती थी। मैं भी उन्ही लोगों में शामिल था, जो उसके तीखे नैनो की जादू में खोता जा रहा था। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ की मेरी दुनिया बिलकुल ही बदल गयी…..

 

आने वाले दिनों में ऐसा क्या हुआ?……….

पढ़िए आगे की पोस्ट में।