अधूरा प्यार

गर्मी के मौसम की गर्म हवाओं में ठंडी हवा के झोंकों सी वो मेरी जिंदगी में आयी थी। पल भर को ठहरी थी, दिल को थोड़ा सा सुकून दे फिर छुमंतर हो गयी। कुछ जादू सा था उसमे, बहुत अलग थी वो बाकी लड़कियों से। कुछ ही दिनों में इतना प्यार और अपनापन दे गयी की उम्र भर अब कमी नहीं होगी। वो कहाँ है? कैसी है? कुछ पता नहीं पर आज भी उसके बारे में बातें करता हूँ। कभी दोस्तों से तो कभी खुद से। मुझे ऐसा करना बहुत अच्छा लगता है। अच्छा लगता है उन सब पलों को याद करना, उन लम्हों के बारे में बाते करना जो मैंने कभी उसके साथ बितायी थी।

शायद उसे इस बात का एहसास बड़ी जल्दी हो गया था की हम दोनों कभी भी एक नहीं हो सकते। इसीलिए समय रहते वो हमारे रिश्ते से बाहर निकल गयी पर मैं आज भी उसी पल में अटका हुआ हूँ जिस पल वो मुझे छोड़ गयी। बरसों बीत गए हैं उस बात को पर मन के किसी कोने में अभी भी एक आस बची हुई है की वो वापस आयेगी, जरूर आयेगी।

Advertisements

शायना

ठाक-ठाक . . . .ठाक-ठाक . . . .

मेरे घर के दरवाजे पर कोई बहुत जोर से हाथ मारे जा रहा था। मेरी माँ ने जैसे ही दरवाजा खोला, उनकी चीख निकल गयी। आवाज सुन मैं माँ की तरफ भागा। माँ भी भागी आ रही थी। मुझे देखते ही मेरी बाँह पकड़ बगल में खड़ी हो गयी। वो डर के मारे बुरी तरह काँप रही थी।

मेरे ठीक सामने सफ़ेद साड़ी पहने, कंधे पर खादी झोला लटकाये एक लड़की खड़ी थी। उसने अपने दाहिने हाथ में देसी कट्टा पकड़ रखा था जो हमारी तरफ तना हुआ था और उसका बायाँ हाथ दरवाजे को बंद करने की कोशिश में लगा हुआ था। दरवाजा लगा के जैसे ही वो हमारी तरफ मुड़ी, मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी। उसका दाहिना हाथ  ढीला पड़ गया था और उसने कट्टे को निचे कर लिया। मेरे समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या करूँ? हजारो तरह के भावों ने मुझे जकड़ लिया था। मेरे चेहरे का रंग पल पल बदल रहा था।

कभी मैं अपने माँ की तरफ देखता तो कभी उस लड़की की तरफ। फिर मैंने माँ से कहा, “माँ, तुम कहती थी न की तुम्हारी होने वाली बहु को मैं कभी घर नहीं लाता। ये लो माँ, आज उसने खुद हमारे घर का रास्ता खोज लिया। माँ, ये शायना है।” और फिर मैंने शायना की तरफ देख कर कहा, “शायना, ये मेरी माँ है। तुम कब से मिलना चाहती थी ना माँ से। आज अच्छे से मिल लो।” –  कुछ दर्द सा महसूस हो रहा था अंदर जैसे मेरे दिल को एक गहरा आघात लगा हो।

“इससे पहले की आप दोनों मुझे और गलत समझें। मुझे कुछ बातें बतानी है आप दोनों को।” – शायना ने अपनी चुप्पी तोड़ी।

“कुछ नहीं, बहुत कुछ जानना है हमें।” – क्रोध पैदा होने लगा था मेरे अंदर जो शायद शब्दों में निकल रहा था।

“मुझे माफ़ कर देना रिजवी। मैं इस तरह तुमलोगो को तकलीफ नहीं देना चाहती थी। पर क्या करती? मेरे पीछे पुलिस पड़ी है और भागते भागते मैं यहाँ पहुँच गयी। मुझे बस थोड़ी देर छुपने के लिए जगह चाहिए। मैं फिर चली जाउंगी।” – शायना के हाथ जुड़े हुए थे।

शायना धीरे धीरे माँ के करीब आई और उनके दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा, “माँ, जितना प्यार आपका बेटा मुझसे करता है उससे भी कहीं ज्यादा प्यार मैं आपके बेटे से करती हूँ। लेकिन मेरा पहला प्यार मेरा देश है। जिस दिन हमारा देश आजाद हो जाएगा और मैं जिन्दा रही तो मैं वादा करती हूँ।  मैं आपके चरणों की सेवा में दौड़ी चली आऊंगी।

मेरा प्यार

बड़ी हैरत से देखा था उसने मुझे। उसकी आँखें लाल हो रही थी। उसके बदन से क्रोध की लपटें निकलने लगी थी। मैंने तो बस इतना कहा था, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

क्या प्यार करना पाप है? क्या मैंने कोई जघन्य अपराध कर दिया? मैंने तो बस अपने मन की बात उसे बतायी थी। बदले में कुछ माँगा तो नहीं था। मैंने ये तो नहीं कहा  था की तुम भी मुझसे प्यार करो। उसे तो खुश होना चाहिए था ये जान कर की कोई उससे प्यार करता है। उसके होने में कोई बात है की लोग उससे प्यार करते हैं। पर नहीं, उन्हें तो बुरा लगा। इतना बुरा की वो हाथ उठाने तक को आतुर हो गयी। उसके मन की वेदना चेहरे पर आ चुकी थी।

मैंने भी अपना गाल आगे बढ़ा दिया था की अगर ऐसा करने से उसका क्रोध शांत होता है तो बुराई क्या है। इस क्रोध के जड़ में मैं था तो फुनगी बन मुझे ही कटना था।