अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ७ – नवमी)

शाम के लगभग ६ बजे थे जब माँ ने आकर जगाया। छुट्टी में दोपहर की नींद इतनी कस के आती है, की मजा ही आ जाता है। कोई न उठाये तो सीधे राते के खाने तक सोने की इच्छा रहती है। मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही थी, पर माँ ने आकर जगा दिया।

“दुर्गा पूजा घूमने नहीं चलना है क्या? जल्दी उठ। सब तैयार हो गए हैं।”

“हाँ माँ, घूमने तो चलना है। बस थोड़ी देर और सोने दे।”

“ठीक है तो फिर तू सो जा, हमलोग घूम कर आते है।”

“अरे माँ, तू तो बुरा मान गयी। चल ये ले, मैं उठ गया।”

उठकर जल्दी जल्दी आँखों में पानी मारी और नए कपड़े पहन के तैयार हो गया। बाहर आया तो देखा सब मेरा ही इन्तेजार कर रहे हैं। आज पूरा परिवार एक साथ दुर्गा पूजा घूमने जा रहा था। माँ, पापा, भाई और मैं – मेरा छोटा पर सुखी परिवार।चूँकि हमारे घर से लेकर सड़क तक जो गली है, उसमे रोशनी की कोई वव्यवस्था नहीं है। हम दोनों भाइयों के हाथ में एक एक टॉर्च पकड़ा दिया गया था। छोटा भाई और पापा आगे आगे, मैं और माँ पीछे से निकल पड़े, दुर्गा पूजा घूमने के लिए।

४ पूजा पंडाल घूमने के बाद हम सभी एक ठेले के सामने खड़े हुए और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण काम – ‘खाना’ शुरू किया हमने। सबसे पहले हमारे हाथ में आया फुचका, बड़ा आनंद आता है खाने में। फिर तो लाइन लग गयी, इस ठेले से उस ठेला बस घूम ही रहे थे। जब हमारा मुँह चलना बंद हुआ तबतक हमने सिर्फ फुचका, चाउमीन, मोमो, समोसा, जलेबी, मिस्टी दोई और पूजा का प्रसाद – खिचड़ी ही खाया था। अभी और भी कुछ चीजें बची थी, पर मौसम का मिजाज देखकर पापा ने कहा –

“चलो आज के लिए इतना काफी है, बाकी कल घूम लेना। बारिश आ गयी तो भागम भाग मच जाएगी।”

मन तो नहीं था पर पापा की बात सही थी और १० भी बजने वाला था। हमलोग घर की तरफ निकल पड़े।

मैंने पूजा घूमने के दौरान कहीं भी अवन्ति को नहीं देखा, बड़ा मन कर रहा था की उससे अगर बात हो जाती। जब रहा नहीं गया तो मैंने माँ से पूछा –

“आज बगल वाली आंटी लोग नहीं दिखाई दी, घर पे भी ताला लगा हुआ था और यहाँ बाजार में नहीं दिखाई दिए।”

“हाँ, वो लोग आज गाडी रिज़र्व कर के सिलीगुड़ी की पूजा घूमने गए है।”

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ६ – माँ दुर्गा)

बस स्टैंड पर हमें ज्यादा इन्तेजार नहीं करना पड़ा। घड़ी की घंटे वाली सुई ११ बजे के आस पास थी और मेटेली की बस समय पर आ गयी थी। चूँकि अभी तक सारे काम काजी लोग अपने अपने ऑफिस पहुँच चुके थे और स्कूली बच्चे भी अपने स्कूल पहुँच पढ़ाई में लगे होंगे, इसीलिए बस काफी खाली थी। हम दोनों ने दरवाजे की तरफ वाली कतार में दूसरी नंबर की सीट पर बैठने का फैसला किया और जैसा की हर लड़की करती है, अवन्ति ने खिड़की वाली सीट हड़प ली।

उसने अपनी कुहनी खिड़की पर टिकाई और आँखों के सामने लटकती लटों को ऊँगली में फंसा बाहर की तरफ देखने लगी और मैं…..?

मैं अवन्ति को देख रहा था। फिर से……

बस के खुलने के थोड़ी देर बाद मैंने ही चुप्पी तोड़ी।

“अवन्ति”

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। उसके सुन्दर चेहरे पर पड़ती धुप की किरणे उसे और सुन्दर बना रही थी। दो पल के लिए मैं तो भूल ही गया था की मुझे कुछ कहना है। अवन्ति ने अपनी भौहें चमका कर पूछा की क्या बात है। मैं झेंप सा गया तब। लेकिन तुरंत ही मैंने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर के कहा –

“तुम्हे लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासाएँ है। अगर तुम्हे सही लगे हो तो मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना है। हाँ, और एक बात, मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ। शांति से सुनने में माहिर। ” – माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने की कोशिश थी।

अवन्ति के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान चली आयी थी लेकिन उसकी आँखें साफ़ बता रही थी की वो कुछ सोच रही है। मुझे भी एहसास हुआ की मैंने पूछने में बहुत जल्दी कर दी, ऐसा कौन होगा जो दो दिन की मुलाकात में अपनी सारी बातें किसी को बता देगा।

“अगर तुम्हे बताने में हिचकिचाहट महसूस हो रही है तो अभी रहने दो, फिर कभी बताना।”

“नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो बस ये सोच रही थी की शायद ये जगह सही नहीं है। मेरी कहानी थोड़ी लम्बी है, समय लग जाएगा।”

“अच्छा तो ये बात है, ठीक है। मुझे इंतजार रहेगा अपनी अगली मुलाकात का।”

हमारी बस चालसा पहुँच गयी थी। कुछ लोग उतरे, ढेर सारे लोग चढ़े और बस फिर घुमावदार रास्तों से होती हुयी मेटेली की तरफ निकल पड़ी। चूँकि मुझे चुप रहना आता है नहीं, तो मैंने अयान और पीहू की बात छेड़ दी। मेटेली पहुँचने तक उन्ही की चर्चा में लगे हुए थे।

माँ दुर्गा बस ने हमें पौने बारह बजे तक मेटेली पंहुचा दिया और १२ बजे तक हमलोग अपने अपने घरों में थे।

एक पत्र मोहब्बत के नाम

मेरी प्रिये,

तुम्हारा नाम लेते ही जो चेहरा उभरता है, उससे अक्सर मुझे प्यार हो जाता है, बार बार हो जाता है। तुम्हें किसी और विशेषण की क्या आवश्यकता, तुम मेरी जिंदगी हो, ये क्या कम है। तुम तक यह बात लिखकर पहुंचा रहा हूँ, क्योंकि तुम्हारे सामने होने पर मैं कुछ बोल नहीं पाता। सोचता बहुत हूँ, कि इस बार मिला तो ये कह दूंगा या वो कह दूंगा। लेकिन कभी कह नहीं पाता।

तुम्हारी मासूम बड़ी-बड़ी सी आँखों से जब तुम मुझे देखकर निश्छल बच्चों सी हँस देती हो, मैं सब कुछ वहीं भूल जाता हूँ। और उसके बाद जब तुम बोलना शुरू करती हो, तो रूकती कहाँ हो, मैं मंत्रमुग्ध हो तुम्हारी बातों में खोया रहता हूँ। इतनी बातें करनी होती है तुम्हें कि मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हारी बातें इतने हीं अक्षरों में पूरी कैसे हो जाती है। और वो जो तुम अपने चेहरे पर आने वाली शिकन को झट से मुस्कान में बदल लेती हो तो मेरे सारे ग़म तकलीफ भी मानो कहीं छूमंतर हो जाती है। जब भी तुम अपने बंधे हुए बालों को खुला छोड़ देती हो, मेरी दिल बस उन बालों में ही उलझ कर रह जाता है। खुले बालों में तुम्हारा चेहरा इतना प्यारा लगता है की मन करता है तुम्हे अपने आँखों से कभी भी ओझल न होने दूँ। कुछ अलग तो है तुम्हारे अंदर कि जो इन्सान तुम्हें एक बार जान ले वो तुम्हें लेकर इतना रक्षात्मक हो जाता है कि दुनिया भर से तुम्हारी मासूमियत को बचा लेना चाहता है।

गुस्से में तुम जो वो गाल फुलाकर बैठ जाती हो ना, इतनी प्यारी लग रही होती हो कि बस वही देखने के लिए तुम्हें कई बार चिढ़ा देता हूँ। लेकिन कभी कभी जब तुम मेरी बातों से दुखी हो जाती हो, तुमसे ज्यादा मेरा मन रो रहा होता है। क्या तुम्हे इस बात का एहसास है की तुम्हारे ख्यालों के अन्दर जाने का तो रास्ता है लेकिन बाहर आने का नहीं। कहना बस इतना है कि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी हर हंसी में साथ हँसने के लिए और तुम्हारे हर आंसू को समेटने के लिए मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँ। मैं तुम्हारी कहानियों में घूमना चाहता हूँ, तुम्हारी चपड़ चपड़ सुनना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ लड़ना और फिर तुम्हें मनाना चाहता हूँ। जिंदगी की भागदौड़ के बीच से ये छोटी-छोटी खुशियाँ चुराना सीखना चाहता हूँ। तुम्हारे हंसी की वजह होना चाहता हूँ। तुमसे जीना सीखना चाहता हूँ।

और हाँ, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। और शायद इससे भी ज्यादा प्यार करना चाहता हूँ।

सिर्फ तुम्हारा

 

अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ५ – अयान बैनर्जी)

मालबाजार के बस स्टैंड से बीएसएनएल के कार्यालय की दुरी कोई ज्यादा नहीं थी इसीलिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। मालबाजार की सड़क पर चलते हुए कई पुरानी यादें ताजा हो गयी और वो पुराना समय फिर से आँखों के सामने घूम गया।

“अचानक मुझे अभी याद आया की मैंने अपना परिचय तो दिया ही नहीं। अगर आप ये सोच रहे हैं की “देव” मेरे घर का नाम है और मेरा स्कूल-कॉलेज वाला नाम “अयान बैनर्जी” है तो आप बिलकुल गलत सोच रहे हैं।

“देवांश रॉय” – ये हूँ मैं।

मेरे दोस्तों ने मेरे नाम को काट छांट कर मुझे “देव” बना दिया। आजकल अक्सर ऐसा ही होता है, किसी का पूरा नाम लेने में मानो जबान साथ ही नहीं देती। लोग अपनी सुविधा के हिसाब से आपका नामकरण करते हैं। पुरे जीवन चक्र में आपका नामकरण लगभग तीन बार होना तो तय है – पहली बार माँ बाप आपका नाम रखेंगे, जिसमे उनकी मर्जी कम और पण्डित जी की मर्जी ज्यादा होती है। दूसरी बार आपके दोस्तों द्वारा आपका नामकरण फिर से किया जाएगा और आखिरी बार आपका नामकरण करेंगी आपकी धर्मपत्नी। पहले दोनों नाम आपको पसंद आये या ना आये पर पत्नी द्वारा रखे हुए नाम पर आप जान छिड़केंगे।

“मेटेली” नाम के एक छोटे से गाँव में पैदा होकर, उसी की गलियों में खेल कूद कर बड़ा हुआ। मेरी प्राथमिक शिक्षा मेटेली से ही हुयी और उच्च विद्यालय की पढाई के लिए मैं रोज मालबाजार जाया करता था। आदर्श उच्च विद्यालय – मेरे स्कूल का नाम था। अपने बचपन से लेकर जवानी तक का सफर मैंने इसी स्कूल में पूरा किया। बारहवीं के बाद मैंने सूर्यसेन कॉलेज, सिलीगुड़ी में अर्जी दी थी और मुझे वहां प्रवेश भी मिल गया। मुझे विज्ञान में कोई ज्यादा रूचि थी नहीं तो मैंने कॉमर्स को चुना अपने अच्छे भविष्य के लिए। फिलहाल मैं द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। “

मैं अपनी ही धुन में चला जा रहा था की पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा, पलट कर देखा तो मेरा दोस्त “अयान बैनर्जी” खड़ा था। अयान के पापा मालबाजार में नौकरी करते थे और उनका अपना मकान भी मालबाजार में ही था। हम दोनों ने पांचवी से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई साथ में की थी। हमेशा साथ साथ रहने वाले दोस्तों में से थे हम। बाकी बच्चे हमारी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। उसे देखते ही मैं ना जाने किन खयालों में खो गया था, शायद स्कूल की यादों ने घेर लिया था। मुझे अचंभित देखकर मेरे कंधे को जोर से झकझोरते हुए अयान से कहा –

“देव भाई, किन खयालों में खो गए?”

“अरे नहीं भाई, बस थोड़ा चौंक गया था। तुमसे ऐसे मिलने की तो कोई उम्मीद ही नहीं थी।” – मैंने होश में आते हुए जवाब दिया।

“उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी की तुम ऐसे मिलोगे, चलो आज मिल ही गए हो तो आओ मेरे साथ। तुमसे किसी को मिलाना है।” – अयान ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर ले जाने लगा।

“भाई रुक जा, पहले मुझे मेरा काम कर लेने दे। फिर तू जहाँ बोलेगा, मैं चलूँगा।” – बड़ी मुश्किल से मैंने अपना हाथ छुड़ाया।

अयान ने कुछ सोचा, फ़ोन कर किसी को थोड़ी देर बाद मिलने की बात कर के उसने कहा –

“वही मैं सोचु, तू बिना काम के तो कहीं आ जा नहीं सकता। चल फिर, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ। मेरे पास बाइक है, तेरा काम जल्दी भी हो जाएगा।” – इतना कह कर अयान बाइक लाने चला गया।

बुलेट की सवारी एक अलग ही आनंद की बात है। अयान को जन्मदिन के तोहफे में पापा से मिली थी। हम दोनों साथ में बीएसएनएल ऑफिस पहुंचे और मेरा काम जल्दी ही हो गया। मेरा काम हो जाने के बाद मैं अयान को ढूंढ रहा था पर वो लड़का कहीं गायब ही हो गया था। पांच मिनट बाद देखा तो अयान फ़ोन पर किसी से बात करते करते मेरी तरफ आ रहा था। शायद किसी से माफ़ी मांग रहा था और कह रहा था की बस पहुंच ही रहा हूँ।

“तेरा काम इतनी जल्दी हो गया” – अयान ने फ़ोन काट दिया था।

“हाँ भाई, जिस अफसर से काम था। वो आज ऑफिस में ही बैठा मिल गया।”

“अच्छा” – अयान के चेहरे पर ख़ुशी थी, की काम जल्दी ही निपट गया।

“अब चल तुझे जहां भी जाना है। पर एक शर्त है, तू जहां भी ले जा मुझे, लेकिन बस स्टैंड ही छोड़ना होगा।” – मैं थोड़ा गंभीर चेहरा बनाने की नाकाम कोशिश में लगा था।

“ऐसी नौबत ही नहीं आएगी मेरे भाई। मैं जिससे तुझे मिला रहा हूँ, वो बस स्टैंड में ही है। चल अब देर ना कर।” अयान ने बाइक स्टार्ट भी कर लिया था।

हमलोग बस स्टैंड पहुंचे ही थे की अयान ने मुझे आगे की तरफ देखने का इशारा किया और मुझे एक लड़की दिखाई दी। ठीक बस स्टैंड से लगे एक पीपल पेड़ के निचे खड़ी थी। उस लड़की ने हमें आते हुए नहीं देखा था, वो हमारे तरफ पीठ कर के
खड़ी थी। उस लड़की के कपड़ों से मुझे ऐसा लग रहा था की ये कहीं अवन्ति तो नहीं। अवन्ति का ख्याल आते ही मेरे मन को ढेर सारे सवालों और खयालों ने घेर लिया। थोड़ी ही देर में मन बेचैन हो उठा।

हम दोनों बाइक से उतरे ही थे की अयान ने मुझे वहीँ रुकने का इशारा किया और खुद आगे जाकर उस लड़की से बातें करने लगा। बातें करते करते अयान ने उस लड़की को मेरी तरफ दिखाया और वही हुआ जो मैं सपने में भी नहीं देखना चाहता था।
पीपल पेड़ के निचे खड़ी वो लड़की अवन्ति ही थी। कुछ ही सेकंड्स में मैंने नजाने क्या क्या सोच लिया। बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।

“अवन्ति……. अयान……. ये दोनों…..”

मैं ये सब सोच ही रहा था, की तब तक दोनों मेरे नजदीक आ गए थे।

“तुम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते हो! अवन्ति ने मुझे अभी अभी बताया। सही में भाई, दुनिया बहुत छोटी है। – अयान ने मुझसे पूछा।

“हाँ, बस कुछ दिनों से जानता हूँ। ये मेरे पड़ोस में रहती है।” – मैं मायूस नजरों से अवन्ति की तरफ देख रहा था।

“अच्छा, तब तो ठीक है…. अच्छा सुन, माजरा ये है की मेरी गर्लफ्रेंड पीहू, अवन्ति की बहुत अच्छी सहेली है। ” – ये सुन कर मेरा सारा ध्यान अवन्ति से हट कर सीधा अयान की बातों पे आ गया था। मैं खुश जो हो गया था।

अयान ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा –
“पर पीहू के घर वाले बहुत सख्त हैं, इसीलिए अवन्ति की मदद से मैं पीहू से मिल पाता हूँ। आज मैंने और पीहू ने ही बुलाया था अवन्ति को, ताकि हम मिल सके।” – अयान की नज़रों से साफ़ दिख रहा था की वो अवन्ति की बहुत इज्जत करता है।

हम दोनो बातें कर रहे थे और अवन्ति बड़े ध्यान से हम दोनों को सुन रही थी। पर मेरी नजर किसी को ढूंढ रही थी। जब रहा न गया तो मैंने अयान से पूछ ही लिया –

” पीहू है कहाँ ? “

“वो पीपल के पीछे खड़ी है, तुमसे मिलने में शर्मा रही है। कोई बात नहीं, फिर कभी मिला दूंगा। अभी तुम लोग निकलो और मुझे मेरे पीहू के पास अकेला रहने दो। ” – ये कह कर अयान मुस्कुराते हुए अपने पीहू के पास चला गया।

अब बचे हम दोनों, मैं और अवन्ति। मैं कुछ सोच रहा था की अवन्ति ने मुझे टोका –

“आज तुमने यहाँ जो कुछ देखा और सुना, ये सब मेरे घरवालों को पता नहीं है और बाकी तुम मुझे समझदार लगते हो। ” – इतना कहकर वो बस स्टैंड में बनी बेंच पर जाकर बैठ गयी।

मैं ये सोच रहा था की अवन्ति से मिले मुझे एक दिन हुआ है, हमारी अब तक ढंग से कोई बात नहीं हुयी है और मैं इसको लेकर उदास और खुश भी होने लगा हूँ। ये मुझे क्या हो रहा है, मैं ठीक तो हूँ ना? अगले ही पल मैंने इन सब बातों को झटक दिया और अवन्ति के बगल में जाकर बैठ गया। बैठते ही मैंने अवन्ति की तरफ देखा कर कहा –

“ये जो तुम कर रही हो अयान और पीहू के लिए, बहुत नेक काम कर रही हो। अगर कभी मेरी जरुरत हो तो बेझिझक कहना, मुझे भी प्यार करने वालों की मदद करके ख़ुशी मिलती है।”

अवन्ति ने मुस्कुरा कर सहमति में सर हिलाया।

“कल तो तुम बहुत जल्दी में थे, इसीलिए हमारी बात ठीक से नहीं हो पाई। चलो आज फिर से कोशिश करते है।” – कहकर अवन्ति ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“अवंतिका रॉयचौधुरी, मेरा पूरा नाम अवंतिका रॉयचौधुरी है, पर प्यार से सब मुझे अवन्ति बुलाते हैं।”

“देवांश रॉय, मेरा पूरा नाम देवांश रॉय है, पर प्यार से सब मुझे देव बुलाते हैं।”

इस तरीके की परिचय के बाद हम दोनों काफी देर तक हंस रहे थे। फिलहाल मुझे समझ में नहीं आ रहा था की और क्या बात करूँ। इसीलिए चुप बैठना ही सही लगा। मन ही मन मैं अयान बैनर्जी को धन्यवाद बोल रहा था, पीहू के बजाए अवन्ति से यूँ मिलाने के लिए।