मेरा प्यार

बड़ी हैरत से देखा था उसने मुझे। उसकी आँखें लाल हो रही थी। उसके बदन से क्रोध की लपटें निकलने लगी थी। मैंने तो बस इतना कहा था, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

क्या प्यार करना पाप है? क्या मैंने कोई जघन्य अपराध कर दिया? मैंने तो बस अपने मन की बात उसे बतायी थी। बदले में कुछ माँगा तो नहीं था। मैंने ये तो नहीं कहा  था की तुम भी मुझसे प्यार करो। उसे तो खुश होना चाहिए था ये जान कर की कोई उससे प्यार करता है। उसके होने में कोई बात है की लोग उससे प्यार करते हैं। पर नहीं, उन्हें तो बुरा लगा। इतना बुरा की वो हाथ उठाने तक को आतुर हो गयी। उसके मन की वेदना चेहरे पर आ चुकी थी।

मैंने भी अपना गाल आगे बढ़ा दिया था की अगर ऐसा करने से उसका क्रोध शांत होता है तो बुराई क्या है। इस क्रोध के जड़ में मैं था तो फुनगी बन मुझे ही कटना था।

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