अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ८ – दशमी – सिन्दूर खेला)

हमारे बंगाल में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन यानी की दशमी के रोज सभी विवाहित स्त्रियाँ लाल पार वाली सफ़ेद साड़ी पहनती है और सुबह सुबह सुबह तैयार होकर सिन्दूर की थाली सजाये अपने मुहल्ले के पूजा पंडाल में पहुँच जाती है। पहले माँ दुर्गा को सिन्दूर लगाया जाता है फिर सब स्त्रियाँ एक दूसरे को सिन्दूर लगाती हैं और हम जैसे नवयुवक और नवयुवती उन स्त्रियों को पैर छूकर प्रणाम करते हैं। आशीर्वाद के रूप में हमारे गालों पर सिन्दूर लगाया जाता है। दशमी के दिन रंग सिर्फ दो दिखाई देंगे, पर माहौल कभी रंग बिरंगा होता है।

मैं भी उस दिन काफी सुबह उठ गया था, फिर नहा धोकर मम्मी के साथ पहुँच गया पूजा पंडाल। वहाँ पहुँचते ही मेरी नजर जिसे ढूंढ रही थी, वो एक कोने में खड़ी मिल गयी। उसकी माँ लाइन में खड़ी थी, माँ दुर्गा की प्रतिमा पर सिन्दूर लगाने के लिए। मेरी माँ को देखते ही उन्होंने अपने पास बुला लिया और दोनों बातें करते करते साथ में प्रतीक्षा करने लगे।

अब मैं रह गया अकेला, पर ज्यादा देर नहीं। कुछ ही मिनटों में अवन्ति की आवाज सुनाई दी।

“तब से तुम्हे बुला रही हूँ, सुनाई नहीं दिया क्या?”

“हाँ ?” – मैंने चौंकते हुए जवाब दिया।

“नहीं, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा। यहाँ शोर बहुत ज्यादा है ना।” – मैंने सफाई दी।

सफ़ेद चूड़ीदार, लाल चुन्नी और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी। इस सीधे सादे परिधान में वो और सुन्दर लग रही थी।

“चलो अब तो मैं ही आ गयी तुम्हारे पास, तब से अकेले खड़े खड़े बोरियत हो गयी थी।”- यही कहते कहते वो मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी थी।

वो अपने शहर के दुर्गा पूजा के बारे में बताने लगी और मैं बड़े ध्यान से उसकी तरफ देखते हुए उसकी बातें सुन रहा था। तब जाकर मुझे पता चला की वो कोलकाता की रहने वाली है। मन में कई सवाल भी उठे, की ऐसा क्या हुआ होगा की कोलकाता में रहने वाला परिवार अचानक मेटेली जैसे छोटे जगह पर आकर बसने की कोशिश कर रहा है। मैं यही सब सोच रहा था की हम दोनों की माँए एक दूसरे को सिन्दूर लगाते हुए हमारे पास आ रहे थे। पास आते ही हम दोनों ने दोनों माँओ को प्रणाम किया और हमारे गालों पर भी सिन्दूर लगा दिया गया। मेरा चेहरा पता नहीं कैसा दिख रहा था पर अवन्ति का चेहरा सिन्दूर की लालिमा से चमक सा गया था। बड़ी प्यारी लग रही थी।

“अच्छा तो तुम देव हो?” – अवन्ति की माँ ने मुझसे पूछा।

“जी, आंटी” – मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“ठीक है तो बेटा, मैं और तुम्हारी माँ, घर जा रहे हैं। तुम दोनों को अगर कुछ देर और यहाँ रहना है तो रहो पर दिन के खाने तक वापस आ जाना। और हाँ बेटा, तुम्हे आज शाम को हमारे घर आना है।” – जाते जाते उन्होंने मुझे निमंत्रण भी दे दिया।

उनके जाते ही मेरे कुछ दोस्त लोग आ गए और मैंने उन सभी को अवन्ति से मिलाया। हमलोग बातों में इतने खो गए थे की समय का पता ही नहीं चला। दोपहर के एक बजने वाले थे। इसीलिए मैंने और अवन्ति से दोस्तों से विदा लिया और तेज क़दमों से घर की तरफ निकल पड़े। अवन्ति के घर का मुख्य दरवाजा मेरे घर से ठीक पहले पड़ता है तो मैंने फिर शाम को मिलने का वादा किया और घर आ गया।

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