अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ९ – दशमी – शाम-२)

अवन्ति के मम्मी और पापा के चले जाने के बाद अचानक मुझे याद आया की मैंने अभी तक अवन्ति को एक हेल्लो तक नहीं बोला। अवन्ति की तरफ देखा तो वो घर का दरवाजा बंद करने में लगी थी। जब वो मेरी तरफ पलटी तो हम दोनों के मुँह से एक साथ हेल्लो निकला, मानो दोनों ने पहले से तय कर रखा था की एक साथ हेल्लो बोलना है। इस बात से हम दोनों के चेहरे पर एक अच्छी सी मुस्कान आ गयी थी।

“चलो बैठते हैं” – अवन्ति ने सोफे के तरफ इशारा करते हुए कहा। उनका सोफा L-शेप वाला था। मैं आराम से जाकर बैठ गया और अवन्ति को इशारा किया की तुम भी बैठो।
“दो मिनट, मैं बस अभी आयी।” – कहकर वो रसोई में चली गयी।
थोड़ी देर में जब वो वापस हॉल में आयी तो उसके एक हाथ में खिचड़ी की प्लेट थी और दूसरे हाथ में पानी का गिलास।
“मम्मी ने कहा था, की पूजा का प्रसाद जरूर खिलाना, सो मैं ले आयी।” – प्लेट और गिलास टेबल पर रख वो सोफे के दूसरे हिस्से में आराम से पालथी मार बैठ गयी।
“पर मैं अकेले कैसे, तुम भी साथ खाती तो अच्छा लगता। मुझे अकेले खाने में थोड़ा अजीब लगता है।”
“अरे नहीं, तुम खाओ, मैंने बहुत खाया है। अभी थोड़ी भी इच्छा नहीं है खाने की।”
“वैसे भी तुम बहुत ज्यादा ले आयी हो, इतना मैं अकेले नहीं खा पाउँगा। या तो तुम एक और चम्मच ले आओ, साथ में खा लेंगे, नहीं तो एक छोटी सी कटोरी ले आओ मैं थोड़ा सा उसमे निकाल लूंगा। बाकी तुम वापस ले जाना। प्रसाद है न, फेंक नहीं सकता।” – प्लेट को वापस टेबल पर रख कर मैं अवन्ति की तरफ मिन्नत भरी नज़रों से ताक रहा था।
“बड़े जिद्दी हो यार तुम, चलो मैं हारी तुम जीते। मैं एक चम्मच ले आती हूँ, पर सिर्फ साथ दूंगी। ज्यादा नहीं खाउंगी।
“अच्छा ठीक है, पहले तुम लाओ तो सही।”

चम्मच लेकर वो मेरे बगल में आ कर बैठ गयी और हम दोनों इधर उधर की बाते करते करते खा रहे थे। अवन्ति बहुत धीरे और थोड़ा थोड़ा खा रही थी की मुझसे रहा ना गया।

“अरे आराम से, इतनी जल्दी जल्दी खाओगी तो सब तुम ही खा जाओगी।” – मैंने बस यूँही हल्का सा मजाक किया था की उसने खाना छोड़ दिया और मुँह बनाकर बैठ गयी। थोड़ा सा ही सही पर उसे फिर से खाने के लिए मनाना पड़ा मुझे। जब मान गयी तो उसने कुछ चम्मच और खाया और हाथ धोने चली गयी।

जब तक वो आई, मैंने भी अपना हिस्सा ख़तम कर लिया था। मैं प्लेट और गिलास लेकर रसोई की तरफ जा ही रहा था की अवन्ति ने बीच में ही मेरे हाथ से दोनों चीजें छीन ली।

“अरे मैं रख देता, अवन्ति।”
“नहीं, तुम जाओ, बैठो। मैं बस आई”

रसोई में से हाथ पोछते हुए अवन्ति बाहर निकली और आकर सोफे में धंस सी गयी। इस बार वो मेरे वाले सोफे के हिस्से में बैठी थी और हम दोनों के बीच का फासला काफी कम रह गया था।

कुछ देर की शान्ति के बाद अवन्ति ने ही चुप्पी तोड़ी।

“एक बात पुछू, सच सच बताना। तुम्हे मेरे बारे में क्यूँ जानना है?” – उसकी उत्सुक तिरछी निगाहों मुझसे जवाब मांग रही थी।
“हाँ, मैं मानता हूँ की हमें एक दूसरे को जाने हुए कुछ दिन ही हुए हैं और मैं तुम्हारे दोस्तों में भी नहीं आता लेकिन ऐसा लगता है की हम दोनों अच्छे दोस्त बन सकते हैं। जब तक हमारी दोस्ती नहीं हो जाती, तब तक पड़ोसी की तरह ही समझ लो। एक पडोसी को अपने पडोसी की पूरी खबर रहनी चाहिए और जिस तरह से मैंने अपनी माँ से तुम लोगो की बारे में थोड़ा थोड़ा सुना है, उत्सुकता बढ़ गयी है ये जानने की आखिर ऐसा क्या हुआ की कोलकाता का एक परिवार मेटेली में आकर रहने लगा है।” – मैं बस बोले जा रहा था और अवन्ति की नजरें मुझ पर ही टिकी हुई थी।

“और कुछ बोलूँ, या तुम मान गयी हो।”
“बस बस.. और नहीं। मैं समझ गयी। अच्छा सुनो न, मैं एक काम करती हूँ। चाय बनने के लिए चढ़ा देती हूँ, चाय के साथ होगी हमारी बात। क्या कहते हो?”
“ख्याल तो काफी अच्छा है ,चलो फिर रसोई में ही बातें करेंगे।”- मेरा सुझाव था।

स्टोव जली, केतली चढ़ी और अवन्ति ने दो कप के हिसाब से दूध और पानी डाल दी और काफी गंभीर होकर अपने पैर के नाखूनों को देखने लगी। मानो वो कुछ सोच रही थी, फिर धीरे से उसने सर उठाया और मेरी तरफ देखा। मेरी उत्सुक निगाहें साफ़ साफ़ सब बयाँ कर रही थी। अवन्ति समझ रही थी की मैं इंतजार कर रहा हूँ और फिर मेरे कानों में आवाज आयी।

“हमारी कहानी शुरू होती है, कोलकाता के बेहाला नाम के जगह से।”

“मेरे पापा इकलौते संतान हैं और मेरे दादा दादी काफी पहले ही बीमारी से गुजर चुके हैं। बचे हम तीन – मम्मी, पापा और मैं। हमारा पुरखो वाला घर है बेहाला में। घर काफी बड़ा था और हम ठहरे सिर्फ तीन, इसीलिए पापा ने काफी कमरे भाड़ा पर लगा रखा है। थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती है भाड़ा से लेकिन हमारा घर चलता था पापा के चायपत्ती के कारोबार से। यह कारोबार पापा अपने एक दोस्त के साथ मिल कर चलाते थे। मेरे पापा हर तरह के चाय के थोक विक्रेता थे। हमारा काफी नाम था, चायपत्ती के कारोबार में। पापा यहीं डुआर्स(उत्तर बंगाल) से माल(चायपत्ती) उठाते थे और कोलकाता(साउथ बंगाल) में बेचते थे। हमारा कारोबार काफी अच्छा चल रहा था। एक दिन पापा के दोस्त घर पर आये हुए थे एक नए बिज़नेस आईडिया के साथ, जो पापा को जँच गयी। वो दोनों मिलकर कारोबार को और आगे फैलाना चाहते थे पर बड़े कारोबार के लिए पैसा भी बड़ा चाहिए। उन्होंने मार्केट से पैसा उठाने का फैसला किया। चूँकि हमारा नाम अच्छा था, काफी लोगो ने हमारे बिज़नेस आईडिया में पैसा लगाया। पर वही, सब का बुरा समय आता है और हमारा भी आया। पापा के दोस्त अचानक कहीं गायब हो गए, कारोबार के लिए इकट्ठे किये हुए सारे पैसो के साथ दूकान के लाखों रूपए भी साथ ले गए। जिस दिन हमें ये बात पता चली, घर में मातम सा माहौल था। लेनदारों के कर्ज, खरीदारों के उधार और बीच में यूँ पापा के दोस्त का गायब हो जाना बहुत बड़ा सदमा था हम सबके लिए। पापा ने बहुत भागा दौरी की पर कुछ अच्छा नहीं हुआ। पापा ने पुलिस में अपने दोस्त के नाम पर FIR दर्ज करवा दी थी। थाना और कोर्ट के चक्कर लगने लगे क्यूँकि लेनदारों ने पापा और उनके दोस्त पर केस कर दिया था। कुछ समय के लिए तो हम तीनो हंसना तक भूल गए थे। पापा का चेहरा हमसे देखा नहीं जाता था।”

चाय बन गयी थी , और अवन्ति चाय को कप में डाल रही थी।

“आजकल किसी भी इंसान पर भरोसा नहीं कर सकते, तुम्हारे पापा के दोस्त ने इतने सालों की दोस्ती का ये सिला दिया” – मैं बहुत दुखी हो गया था।

“अरे रुको अभी, ये तो दुखों की शुरुआत है।” – अवन्ति ने चाय का कप मुझे पकड़ाते हुए कहा।

“अवन्ति, अब तो मुझे लग रहा है की मैंने बहुत गलत किया ये सब पूछ के। मैंने तुम्हारे सारे दुःख-दर्द फिर से ताजा कर दिए। लेकिन कुछ दिनों से सोच सोच के परेशान भी हो रहा था की पता नहीं क्या हुआ होगा की कोलकाता का एक परिवार मेटेली में आ कर बस गया। अगर मेरी वजह से तुम्हे बुरा लगा है तो मैं माफ़ी मांगता हूँ।” – मुझे काफी बुरा लग रहा था।

“अरे नहीं देव, ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ के बहुत सारे लोगो ने मुझसे यही सवाल पूछा था, पर मैंने सबको टाल दिया। लेकिन पता नहीं क्यों, तुम्हे बताने का मन किया।” – अवन्ति ने मेरा मूड ठीक करने की कोशिश की थी।

“तो ठीक है, आगे की कहानी सुनो फिर।” हम दोनों चाय का कप हाथ में लिए सोफा पर आकर बैठ गए थे।

“पापा को अपने दोस्त से जो धोखा मिला था, उस बात के दो महीने बीत गए थे। इस बीच मेरी उच्च माध्यमिक की परीक्षा भी थी। जाहिर सी बात थी, की मेरी पढ़ाई और परीक्षा दोनों पर इस बात का असर पड़ा था। पापा और मम्मी की तबियत भी ख़राब रहने लगी थी। पापा का दूकान पर जाने का मन नहीं करता था। मालिक के दूकान पर नहीं होने का जो असर होता है, वही दिख रहा था। आमदनी काफी घट गयी थी। दूकान के कर्मचारियों को तनख्वाह देने में भी अब दिक्कत होने लगी थी। धीरे धीरे कर्मचारी लोग भी काम छोड़ने लगे एक एक कर के। अंत में दूकान बंद करने की नौबत आ गयी।

अचानक एक दिन मालबाजार से एक फ़ोन आया। पापा जिस डीलर से चायपत्ती लेते थे, उन्ही का फ़ोन था। उन्होंने बस ये जानने के लिए फ़ोन किया था की इस महीने मेरे पापा का आर्डर क्युं नहीं गया। पापा ने बड़े भारी मन से उन्हें सब कुछ बताया। उन्हें ये सब जान कर बहुत दुःख हुआ। पर वो कुछ कर भी नहीं सकते थे, सिवाये खेद जताने के। उन्होंने फिर फ़ोन करने की बात करके फ़ोन रख दिया।

इस फ़ोन के बाद पापा बहुत देर तक कुछ सोचते रहे। रात के खाने के वक़्त उन्होंने उस सोच से हम दोनों को वाकिब कराया। पापा ने बताया की वो बहुत दिनों से कुछ सोच रहे थे। आज जा कर उन्हें कुछ आईडिया मिला है। पापा चाहते थे की अब कोलकाता में वो रह नहीं पाएंगे। क्यूंकि जिस तरह के हालात है, उन हालातों में फिर से कोलकाता में कारोबार को चलाना नामुमकिन सा लग रहा था। नया माल खरीदने के लिए पैसे तक नहीं बचे थे और हमारा नाम भी खराब हो गया था मार्केट में। अंत में पापा ने बस इतना ही कहा की हमें घर और दूकान दोनों बेचना होगा, तभी जाकर लेनदारों के कर्ज से मुक्ति मिलेगी। इन बातों को बताते वक़्त पापा की आँखों में आंसू थे। मैं और मम्मी बस चुपचाप पापा को सुने जा रहे थे।

कर्ज चुकाने के बाद जो कुछ पैसे बचेंगे उन पैसों से पापा फिर से एक छोटा मोटा कारोबार शुरू करेंगे। चूँकि आजतक उन्होंने चायपत्ती के अलावा और किसी चीज का कारोबार किया ही नहीं था। उन्होंने फिर से चायपत्ती का ही कारोबार करने की सोची थी, पर इस बार अकेले और कोलकाता से बाहर। डुआर्स के कुछ लोग पापा को अच्छे से जानते थे, क्यूंकि कारोबार के सिलसिले में पापा का बहुत बार उधर जाना हुआ था। मालबाजार वाले डीलर के फ़ोन के बाद शायद पापा ने उधर के और भी कई लोगो से बाते कर ली थी और उन्हें अपनी तकलीफ और नए कारोबार के बारे में बताया था। जब उन्हें लगा की वो लोग पापा की हर तरह से मदद करने को तैयार हैं, तभी पापा ने ये बात हम दोनों को बतायी। नए दूकान के लिए उन्होंने मालबाजार वाले डीलर से बात की थी और उन्होंने भी पूरी मदद करने का वादा किया। अब बात रह गयी थी, कोर्ट के केस से छुटकारा पाने की तो उन्होंने रियल स्टेट वालो से बात कर के हमारे मकान और दूकान को सही दाम में बिकवाने की बात की। दूकान को खरीदने वाले तो बहुत मिल गए और हमारी दूकान अच्छे दाम पर बिक भी गयी पर हमारा घर बड़ा था और पुश्तैनी भी तो खरीदार मिलने में वक़्त लग रहा था। पापा की तबियत तो धीरे धीरे सुधर गयी पर मम्मी की हालत बहुत बिगड़ गयी थी। डॉक्टर ने सलाह दी थी की उन्हें एक ऐसे जगह पर ले जाओ जहां प्रकृति के बहुत करीब रहा जा सके। खुली हवा और पेड़ पहाड़ के बीच उनकी तबियत जल्दी ठीक हो जायेगी। मेरी मम्मी की बीमारी कोई शारीरिक नहीं थी, पिछले कुछ महीनो में जो हुआ था उनका बहुत बुरा असर पड़ा था मम्मी की सेहत पर। उनके अंदर बहुत दुःख भरा हुआ था पर वो पापा के सामने कभी जाहिर नहीं की। सब अंदर भरा हुआ था, जिसका असर उनके शरीर पर हुआ। पापा ने पहले सोचा था की जब कोलकाता में सब कुछ निपट जायेगा तो वो मालबाजार में ही घर ले लेंगे और वहीँ अपनी नयी दूकान खोलेंगे। लेकिन जब मम्मी की बात आयी तो डुआर्स के एक जान पहचान के आदमी ने पापा को मेटेली और सामसिंग के बारे में बताया। इन दोनों जगहों में मेटेली नजदीक पड़ता था मलबाज़ार से। पापा ने फिर तय किया की कोलकाता से सब निपटा के मेटेली में घर लेंगे और मालबाज़ार में अपनी दूकान खोलेंगे।

इस बीच हमने अपने घर में रहने वाले सारे लोगो को घर खाली करने को कह दिया था। महीने भर का इंतजार और फिर एक खरीदार मिला जो हमारा घर खरीदना चाहता था। बाजार के भाव से थोड़ा कम पर ठीक ठाक दाम मिल रहा था तो पापा ने आख़िरकार घर उनके नाम कर दिया। हफ्ते भर बाद जब पापा को रकम मिली तो उन्होंने सबसे पहले लेनदारों से बात की और कोर्ट के बाहर ही उनसे सारी बात निपटा ली। चिंता रह गयी थी तो अब एक बात की, मेटेली में घर लेना है। उसके लिए पापा ने अपने जान पहचान वाले लोगो से बात की तो इसी घर के बारे में पता चला और पापा ने बात पक्की कर दी। अब पापा अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे। कुछ ही दिनों में आखिर वो रात भी आयी जो हमारी आखिरी रात थी, हमारे खुद के घर में। ये सोच कर ही कितना अजीब लगता है, है न देव?” – अवन्ति ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।

“हाँ अवन्ति, उस पल के बारे में सोच कर ही मेरा मन दहल गया है, की कैसे बीती होगी वो रात?” – उदासी उमड़ आयी थी मेरे चेहरे पर।

“वो रात बहुत अजीब थी, हम तीनो एक ही कमरे में साथ लेटे हुए थे। कोई बात नहीं कर रहा था, सब अपने अंदर के ग़म को अपने तक ही सिमित रखना चाहते थे। क्यूंकि बातों बातों में अगर कोई एक टूट जाता तो फिर कोई सम्भल नहीं पाता।
उस रात कोई नहीं सो पाया, पूरी रात हम लोग बस अपने घर की दीवार और छत निहार रहे थे।” – अवन्ति की दोनों आँखों में मोटे मोटे आंसू की बूँदें छलछला उठी थी।

“अवन्ति, जरा चाय की तरफ भी एक नजर डाल लो। चाय की कप कब से तुम्हारे चेहरे को ताक रही है की तुम कब उसे अपने हाथों में लोगी। जरा रहम करो उस बेचारे पर। कहानी तो चलती रहेगी।” – मैंने अवन्ति को बीच में रोकते हुए कहा।

अवन्ति ने मेरी तरफ देखा और मुस्काई फिर जैसे ही उसने अपनी पलकें झपकाई, आँसू की दो बूँदें सूखे गालों पर एक रेखा सी बनाती हुयी फिसल गयी। उसने बड़ी मुश्किल से अपने जज्बातों पर काबू किया और चाय की एक चुस्की लेकर फिर आगे की आपबीती बताने लगी।

“वो रात तो बस हमारे आँखों में ही बीत गई। सुबह से ही मैं और मम्मी कुछ सामान समेटने में लग गए। पापा को बाहर कुछ काम था तो वो नास्ता कर के निकल गए। शाम को हमारी ट्रैन थी सियालदह रेलवे स्टेशन से। दिन भर हमने पैकिंग की और शाम को जब कार आ गयी तो हम तीनो घर के बाहर खड़े आखिरी बार बड़े ही कातर मन से अपने घर को निहार रहे थे। मम्मी और पापा की तरफ देखने की मेरी हिम्मत तो थी नहीं और मेरे आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बड़े ही भारी मन से हमने अपने घर को अलविदा कहा और चुपचाप कार में बैठ गए। और इस तरह १४-१५ घंटे की यात्रा के बाद हम लोग यहाँ आ गए। मुझे अब भी याद है कैसे तुम्हारी माँ हमारे लिए दोपहर का खाना बनाकर लायी थी। तुम्हारी माँ बहुत अच्छी है देव।” – अवन्ति ने चाय की आखिरी चुस्की ली।

“सॉरी अवन्ति, इतना कुछ हो गया होगा, इसका मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था।” – अवन्ति का रुआँसा चेहरा देख मुझे बहुत बुरा लग रहा था।

“नहीं देव, सॉरी बात बोलो। मुझे भी कोई ऐसा चाहिए था जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ। मुझे अच्छा लगा जिस तरह से तुमने मुझे सुना और अपनी बात कही। थैंक्स देव।”

“मैंने शायद कभी तुम्हे बताया था की मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ, अगर तुम्हे वो बात याद है तो आज ये साबित भी हो गया।” – मेरी इस बात पर हम दोनों हंस रहे थे और माहौल थोड़ा हल्का हो गया था।

“अच्छा अवन्ति, तो फिर तुम्हारी पढ़ाई?”
“उच्च माध्यमिक की परीक्षा तो मैं तब दे ही रही थी, जब ये झमेला चल रहा था और मेरे यहाँ आने तक रिजल्ट भी आ गया था। तुम्हे ये जान कर ख़ुशी होगी की मैंने फर्स्ट डिवीज़न से पास किया है। बात रही आगे की पढ़ाई की तो मैंने यहाँ पर मालबाजार कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स में दाखिला ले लिया है। मुझे शुरू से ही इंग्लिश पढ़ने का बड़ा शौक था, वो शौक अब पूरा हो रहा है।” – अवन्ति की आँखों में एक अलग सी चमक थी ये बताते हुए।

“वैसे अंकल ने यहाँ पर किस तरह का कारोबार शुरू किया है? इतना तो पता है की चायपत्ती का है, पर क्या फिर से कोलकाता की तरह थोक में खरीद बिक्री कर रहे हैं या कुछ और?” – कब से मेरे मन में जिज्ञासा थी।

“नहीं नहीं, कारोबार तो चायपत्ती का ही है, पर कोलकाता की तरह नहीं। यहाँ पर पापा ने कच्ची चाय की पत्ती को चाय बागान से सीधे फैक्ट्री तक पहुंचाने का काम शुरू किया है। कोलकाता से जो कुछ पैसे बचे थे पापा ने उससे दो पिकअप ट्रक खरीदा है और चार लोगों को नौकरी पर रखा है। इस काम में मालबाजार वाले चाय के डीलर ने काफी मदद की और अब ये काम धीरे धीरे पटरी पर आ रहा है।”

“अच्छा, हाँ इस काम के बारे में मुझे पता है। मेरे एक दोस्त के पापा भी इसी काम से जुड़े हुए हैं। शुरुआत के लिए ये काम अच्छा है, धीरे धीरे अंकल को और भी आइडियाज मिलेंगे की कैसे कारोबार को आगे बढ़ाया जाए।”

“हाँ पापा भी यही बोल रहे थे। एकबार ये वाला काम सही से चल जाये फिर पापा और कुछ सोचेंगे।”

“ठीक ही है, एक साथ दो-चार जगह हाथ लगाने से अच्छा है की पहले एक काम ठीक से चल पड़े। बाकी तो फिर होता ही रहेगा। चलो ये सब तो काफी अच्छा हुआ, और….. ” – मैं कुछ कहने ही वाला था की दरवाजे की घंटी बजी। शायद अंकल-आंटी आ गए थे।

“अरे बेटा, तुम अभी तक यहीं हो। चलो अच्छा हुआ, अवन्ति का मन लग गया होगा। – अवन्ति के पापा उसके पास आकर बैठ गए थे।
“और बेटा, अवन्ति ने तुम्हे कुछ खिलाया की नहीं।” – आंटी अवन्ति की तरफ देखते हुए मुझसे पूछ रही थी।

“नहीं आंटी, बस प्रसाद खिलाया।” – मैं अवन्ति की तरफ देख हल्की हल्की शैतानो वाली हंसी हंस रहा था।

“कोई बात नहीं बेटा, तुम बस बैठो। मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना बना के लाती हूँ। ये अवन्ति तो कोई काम की नहीं है, मेहमान को भूखा रख दिया।” -आंटी भी मेरे साथ थी।

थोड़े बहुत मजाक के बाद मैंने सबसे विदा ली और जब अवन्ति दरवाजे तक छोड़ने आयी तो मैंने उसे याद दिलाया।

“मेरा एक सवाल अधूरा रह गया आज। फिर कभी पूछूंगा। चलो बाय। गुड नाईट।”

“गुड नाईट। टेक केयर।” – अवन्ति ने हाथ हिलाते हुए विदा किया।

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अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ९ – दशमी – शाम)

दोपहर को खाना खाने के बाद मैं लेट गया था, पर नींद ही नहीं आयी। नींद नहीं आने का कारण शायद अवन्ति थी, शाम को उसकी मम्मी ने बुलाया था और मैं लेट नहीं होना चाहता था। अवन्ति की माँ के ऊपर मैं एक अच्छी छाप छोड़ना चाहता था। इसीलिए जैसे ही घड़ी की सुई ने पाँच बजाया, मैं झटपट तैयार होकर, अच्छी सी खुशबु वाली परफ्यूम लगा के आँखें झपकते ही अवन्ति के घर के दरवाजे पर खड़ा घण्टी बजा रहा था।

“अरे बेटे तुम!, आओ आओ, अंदर आ जाओ।” – अवन्ति की माँ ने दरवाजा खोला।

“आप कहीं जा रही हैं क्या?”- आंटी के कपड़ों को देख मुझे लगा की कहीं जाने के लिए आंटी बस निकलने ही वाली थी।

कलाई में घडी पहनते हुए अंदर के कमरे से अंकल भी निकल कर आये तो मैंने उन्हें नमस्ते किया।

“हाँ देव, हम दोनो बस निकल ही रहे हैं। आज मेरे एक दोस्त ने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी है। हमलोगो को आते आते लेट होगी, तो तुम कुछ देर अवन्ति के साथ रह जाना। हम उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे, पर उसकी जिद है की वो पार्टी में नहीं जायेगी। आजकल के बच्चे और उनकी जिद। हम माँ बाप को ही हार माननी पड़ती है।” – अंकल जूता पहनने में लगे थे।

“सॉरी बेटा, तुम्हे यूँ बुला कर मैं ही बाहर जा रही हूँ, अच्छा नहीं लग रहा।”- आंटी का चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था। शायद उनकी इच्छा नहीं थी जाने की पर अंकल के कहने पर जा रही होंगी। मैं शायद उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

“कोई बात नहीं आंटी, आज आप घूम कर आइये। आपका घर कोई दूर थोड़े ना है, मैं फिर आ जाऊँगा जब आप घर पर रहोगी।” – मन ही मन मैं खुश हो रहा था की अवन्ति के साथ अकेले समय बिताने का इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था।

घर के हॉल में खड़े हम तीनों बाते कर रहे थे और अवन्ति अपने कमरे के दरवाजे से टिक कर खड़ी थी और हमारी बातें सुन  कर तरह तरह के चेहरे बना रही थी।

“अवन्ति, इधर आओ और देव के लिए कुछ नास्ता बना लो और हाँ, पूजा का प्रसाद देना मत भूलना। – आंटी ने अवन्ति को आवाज लगाते हुए कहा।
“ठीक है तो बेटा, तुम दोनों थोड़ा टाइम पास करो। हम दोनों आते हैं।”- अवन्ति के पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा।

मेरे कंधे पर पड़े उस हाथ ने मुझे बहुत कुछ कह दिया। अंकल शायद ये कहना चाहते थे की अपनी बेटी को तुम्हारे भरोसे छोड़े जा रहा हूँ। मेरा भरोसा बरक़रार रखना।

“अच्छी बात है अंकल, आप दोनों अच्छे से जाइए और जल्दी आइए। हमें आपका इन्तेजार रहेगा।” – मैं और अवन्ति अगल बगल में खड़े अंकल आंटी को बाय बोल रहे थे।