अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ६ – माँ दुर्गा)

बस स्टैंड पर हमें ज्यादा इन्तेजार नहीं करना पड़ा। घड़ी की घंटे वाली सुई ११ बजे के आस पास थी और मेटेली की बस समय पर आ गयी थी। चूँकि अभी तक सारे काम काजी लोग अपने अपने ऑफिस पहुँच चुके थे और स्कूली बच्चे भी अपने स्कूल पहुँच पढ़ाई में लगे होंगे, इसीलिए बस काफी खाली थी। हम दोनों ने दरवाजे की तरफ वाली कतार में दूसरी नंबर की सीट पर बैठने का फैसला किया और जैसा की हर लड़की करती है, अवन्ति ने खिड़की वाली सीट हड़प ली।

उसने अपनी कुहनी खिड़की पर टिकाई और आँखों के सामने लटकती लटों को ऊँगली में फंसा बाहर की तरफ देखने लगी और मैं…..?

मैं अवन्ति को देख रहा था। फिर से……

बस के खुलने के थोड़ी देर बाद मैंने ही चुप्पी तोड़ी।

“अवन्ति”

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। उसके सुन्दर चेहरे पर पड़ती धुप की किरणे उसे और सुन्दर बना रही थी। दो पल के लिए मैं तो भूल ही गया था की मुझे कुछ कहना है। अवन्ति ने अपनी भौहें चमका कर पूछा की क्या बात है। मैं झेंप सा गया तब। लेकिन तुरंत ही मैंने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर के कहा –

“तुम्हे लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासाएँ है। अगर तुम्हे सही लगे हो तो मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना है। हाँ, और एक बात, मैं बहुत अच्छा श्रोता हूँ। शांति से सुनने में माहिर। ” – माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने की कोशिश थी।

अवन्ति के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान चली आयी थी लेकिन उसकी आँखें साफ़ बता रही थी की वो कुछ सोच रही है। मुझे भी एहसास हुआ की मैंने पूछने में बहुत जल्दी कर दी, ऐसा कौन होगा जो दो दिन की मुलाकात में अपनी सारी बातें किसी को बता देगा।

“अगर तुम्हे बताने में हिचकिचाहट महसूस हो रही है तो अभी रहने दो, फिर कभी बताना।”

“नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो बस ये सोच रही थी की शायद ये जगह सही नहीं है। मेरी कहानी थोड़ी लम्बी है, समय लग जाएगा।”

“अच्छा तो ये बात है, ठीक है। मुझे इंतजार रहेगा अपनी अगली मुलाकात का।”

हमारी बस चालसा पहुँच गयी थी। कुछ लोग उतरे, ढेर सारे लोग चढ़े और बस फिर घुमावदार रास्तों से होती हुयी मेटेली की तरफ निकल पड़ी। चूँकि मुझे चुप रहना अच्छा लगता है पर ना जाने क्यूँ, अवन्ति से बातें करने का मन कर रहा था। मैंने फिर अयान और पीहू की बात छेड़ दी। मेटेली पहुँचने तक हम दोनों उन्ही की चर्चा में लगे हुए थे।

माँ दुर्गा बस ने हमें पौने बारह बजे तक मेटेली पंहुचा दिया और १२ बजे तक हमलोग अपने अपने घरों में थे।

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