अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ५ – अयान बैनर्जी)

मालबाजार के बस स्टैंड से बीएसएनएल के कार्यालय की दुरी कोई ज्यादा नहीं थी इसीलिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। मालबाजार की सड़क पर चलते हुए कई पुरानी यादें ताजा हो गयी और वो पुराना समय फिर से आँखों के सामने घूम गया।

“अचानक मुझे अभी याद आया की मैंने अपना परिचय तो दिया ही नहीं। अगर आप ये सोच रहे हैं की “देव” मेरे घर का नाम है और मेरा स्कूल-कॉलेज वाला नाम “अयान बैनर्जी” है तो आप बिलकुल गलत सोच रहे हैं।

“देवांश रॉय” – ये हूँ मैं।

मेरे दोस्तों ने मेरे नाम को काट छांट कर मुझे “देव” बना दिया। आजकल अक्सर ऐसा ही होता है, किसी का पूरा नाम लेने में मानो जबान साथ ही नहीं देती। लोग अपनी सुविधा के हिसाब से आपका नामकरण करते हैं। पुरे जीवन चक्र में आपका नामकरण लगभग तीन बार होना तो तय है – पहली बार माँ बाप आपका नाम रखेंगे, जिसमे उनकी मर्जी कम और पण्डित जी की मर्जी ज्यादा होती है। दूसरी बार आपके दोस्तों द्वारा आपका नामकरण फिर से किया जाएगा और आखिरी बार आपका नामकरण करेंगी आपकी धर्मपत्नी। पहले दोनों नाम आपको पसंद आये या ना आये पर पत्नी द्वारा रखे हुए नाम पर आप जान छिड़केंगे।

“मेटेली” नाम के एक छोटे से गाँव में पैदा होकर, उसी की गलियों में खेल कूद कर बड़ा हुआ। मेरी प्राथमिक शिक्षा मेटेली से ही हुयी और उच्च विद्यालय की पढाई के लिए मैं रोज मालबाजार जाया करता था। आदर्श उच्च विद्यालय – मेरे स्कूल का नाम था। अपने बचपन से लेकर जवानी तक का सफर मैंने इसी स्कूल में पूरा किया। बारहवीं के बाद मैंने सूर्यसेन कॉलेज, सिलीगुड़ी में अर्जी दी थी और मुझे वहां प्रवेश भी मिल गया। मुझे विज्ञान में कोई ज्यादा रूचि थी नहीं तो मैंने कॉमर्स को चुना अपने अच्छे भविष्य के लिए। फिलहाल मैं द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। “

मैं अपनी ही धुन में चला जा रहा था की पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा, पलट कर देखा तो मेरा दोस्त “अयान बैनर्जी” खड़ा था। अयान के पापा मालबाजार में नौकरी करते थे और उनका अपना मकान भी मालबाजार में ही था। हम दोनों ने पांचवी से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई साथ में की थी। हमेशा साथ साथ रहने वाले दोस्तों में से थे हम। बाकी बच्चे हमारी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। उसे देखते ही मैं ना जाने किन खयालों में खो गया था, शायद स्कूल की यादों ने घेर लिया था। मुझे अचंभित देखकर मेरे कंधे को जोर से झकझोरते हुए अयान से कहा –

“देव भाई, किन खयालों में खो गए?”

“अरे नहीं भाई, बस थोड़ा चौंक गया था। तुमसे ऐसे मिलने की तो कोई उम्मीद ही नहीं थी।” – मैंने होश में आते हुए जवाब दिया।

“उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी की तुम ऐसे मिलोगे, चलो आज मिल ही गए हो तो आओ मेरे साथ। तुमसे किसी को मिलाना है।” – अयान ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर ले जाने लगा।

“भाई रुक जा, पहले मुझे मेरा काम कर लेने दे। फिर तू जहाँ बोलेगा, मैं चलूँगा।” – बड़ी मुश्किल से मैंने अपना हाथ छुड़ाया।

अयान ने कुछ सोचा, फ़ोन कर किसी को थोड़ी देर बाद मिलने की बात कर के उसने कहा –

“वही मैं सोचु, तू बिना काम के तो कहीं आ जा नहीं सकता। चल फिर, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ। मेरे पास बाइक है, तेरा काम जल्दी भी हो जाएगा।” – इतना कह कर अयान बाइक लाने चला गया।

बुलेट की सवारी एक अलग ही आनंद की बात है। अयान को जन्मदिन के तोहफे में पापा से मिली थी। हम दोनों साथ में बीएसएनएल ऑफिस पहुंचे और मेरा काम जल्दी ही हो गया। मेरा काम हो जाने के बाद मैं अयान को ढूंढ रहा था पर वो लड़का कहीं गायब ही हो गया था। पांच मिनट बाद देखा तो अयान फ़ोन पर किसी से बात करते करते मेरी तरफ आ रहा था। शायद किसी से माफ़ी मांग रहा था और कह रहा था की बस पहुंच ही रहा हूँ।

“तेरा काम इतनी जल्दी हो गया” – अयान ने फ़ोन काट दिया था।

“हाँ भाई, जिस अफसर से काम था। वो आज ऑफिस में ही बैठा मिल गया।”

“अच्छा” – अयान के चेहरे पर ख़ुशी थी, की काम जल्दी ही निपट गया।

“अब चल तुझे जहां भी जाना है। पर एक शर्त है, तू जहां भी ले जा मुझे, लेकिन बस स्टैंड ही छोड़ना होगा।” – मैं थोड़ा गंभीर चेहरा बनाने की नाकाम कोशिश में लगा था।

“ऐसी नौबत ही नहीं आएगी मेरे भाई। मैं जिससे तुझे मिला रहा हूँ, वो बस स्टैंड में ही है। चल अब देर ना कर।” अयान ने बाइक स्टार्ट भी कर लिया था।

हमलोग बस स्टैंड पहुंचे ही थे की अयान ने मुझे आगे की तरफ देखने का इशारा किया और मुझे एक लड़की दिखाई दी। ठीक बस स्टैंड से लगे एक पीपल पेड़ के निचे खड़ी थी। उस लड़की ने हमें आते हुए नहीं देखा था, वो हमारे तरफ पीठ कर के
खड़ी थी। उस लड़की के कपड़ों से मुझे ऐसा लग रहा था की ये कहीं अवन्ति तो नहीं। अवन्ति का ख्याल आते ही मेरे मन को ढेर सारे सवालों और खयालों ने घेर लिया। थोड़ी ही देर में मन बेचैन हो उठा।

हम दोनों बाइक से उतरे ही थे की अयान ने मुझे वहीँ रुकने का इशारा किया और खुद आगे जाकर उस लड़की से बातें करने लगा। बातें करते करते अयान ने उस लड़की को मेरी तरफ दिखाया और वही हुआ जो मैं सपने में भी नहीं देखना चाहता था।
पीपल पेड़ के निचे खड़ी वो लड़की अवन्ति ही थी। कुछ ही सेकंड्स में मैंने नजाने क्या क्या सोच लिया। बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।

“अवन्ति……. अयान……. ये दोनों…..”

मैं ये सब सोच ही रहा था, की तब तक दोनों मेरे नजदीक आ गए थे।

“तुम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते हो! अवन्ति ने मुझे अभी अभी बताया। सही में भाई, दुनिया बहुत छोटी है। – अयान ने मुझसे पूछा।

“हाँ, बस कुछ दिनों से जानता हूँ। ये मेरे पड़ोस में रहती है।” – मैं मायूस नजरों से अवन्ति की तरफ देख रहा था।

“अच्छा, तब तो ठीक है…. अच्छा सुन, माजरा ये है की मेरी गर्लफ्रेंड पीहू, अवन्ति की बहुत अच्छी सहेली है। ” – ये सुन कर मेरा सारा ध्यान अवन्ति से हट कर सीधा अयान की बातों पे आ गया था। मैं खुश जो हो गया था।

अयान ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा –
“पर पीहू के घर वाले बहुत सख्त हैं, इसीलिए अवन्ति की मदद से मैं पीहू से मिल पाता हूँ। आज मैंने और पीहू ने ही बुलाया था अवन्ति को, ताकि हम मिल सके।” – अयान की नज़रों से साफ़ दिख रहा था की वो अवन्ति की बहुत इज्जत करता है।

हम दोनो बातें कर रहे थे और अवन्ति बड़े ध्यान से हम दोनों को सुन रही थी। पर मेरी नजर किसी को ढूंढ रही थी। जब रहा न गया तो मैंने अयान से पूछ ही लिया –

” पीहू है कहाँ ? “

“वो पीपल के पीछे खड़ी है, तुमसे मिलने में शर्मा रही है। कोई बात नहीं, फिर कभी मिला दूंगा। अभी तुम लोग निकलो और मुझे मेरे पीहू के पास अकेला रहने दो। ” – ये कह कर अयान मुस्कुराते हुए अपने पीहू के पास चला गया।

अब बचे हम दोनों, मैं और अवन्ति। मैं कुछ सोच रहा था की अवन्ति ने मुझे टोका –

“आज तुमने यहाँ जो कुछ देखा और सुना, ये सब मेरे घरवालों को पता नहीं है और बाकी तुम मुझे समझदार लगते हो। “

मैं मुस्कुरा रहा था और ये सोच रहा था की अवन्ति से मिले मुझे एक दिन हुआ है, हमारी अब तक ढंग से कोई बात नहीं हुयी है और मैं इसको लेकर उदास और खुश भी होने लगा हूँ। ये मुझे क्या हो रहा है, मैं ठीक तो हूँ ना? अगले ही पल मैंने इन सब बातों को झटक दिया और अवन्ति की तरफ देख कर कहा –

“ये जो तुम कर रही हो अयान और पीहू के लिए, बहुत नेक काम कर रही हो। अगर कभी मेरी जरुरत हो तो बेझिझक कहना, मुझे भी प्यार करने वालों की मदद करके ख़ुशी मिलती है।”

अवन्ति ने मुस्कुरा कर सहमति में सर हिलाया।

मैंने भी जवाब में मुस्कुरा दिया और हाथों के इशारे से उस से विदा लेकर जा ही रहा था की आवाज आयी –
“अच्छा सुनो।”

“हाँ” – मैंने पलट कर कहा।

“कल शाम को जब हम मिले थे तुम्हारे घर पर तब तो तुम बहुत जल्दी में थे और सुबह बस में भी हमारी बात नहीं हो पाई। अभी भी तुम बस बाय बोलकर जा रहे हो। चलो न, कहीं बैठ कर बातें करते हैं। वैसे भी बस के आने में अभी देर है।” – कहकर अवन्ति बस स्टॉप पर लगे बेंच की तरफ बढ़ गयी।

मैं भी पीछे से जाकर उसके बगल में बैठ गया और अवन्ति की तरफ देख कर थोड़ा मुस्कुरा दिया।

“मैंने कह तो दिया की बातें करेंगे पर शुरुआत कहाँ से करूँ ये समझ में नहीं आ रहा।” – ये कहते हुए अवन्ति हंस तो रही थी पर उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे। जो देखते ही देखते ख़ुशी में बदल गए।

“अवंतिका रॉयचौधुरी, मेरा पूरा नाम अवंतिका रॉयचौधुरी है, पर प्यार से सब मुझे अवन्ति बुलाते हैं।”

“देवांश रॉय, मेरा पूरा नाम देवांश रॉय है, पर प्यार से सब मुझे देव बुलाते हैं।”

इस तरीके की परिचय के बाद हम दोनों काफी देर तक हंस रहे थे। फिलहाल मुझे समझ में नहीं आ रहा था की क्या बात करूँ। मैं बस अवन्ति की बातें सुन रहा था और मन ही मन अयान बैनर्जी को धन्यवाद बोल रहा था, पीहू के बजाए अवन्ति से यूँ मिलाने के लिए।

 

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