अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य १ – बरामदा)

अक्टूबर का महीना था, ठंडी का मौसम अपना रंग दिखाने लगा था। सुबह और शाम को ठण्ड थोड़ी बढ़ जाती थी। दिन में थोड़ी बहुत धुप निकलती थी जिससे मौसम सुहाना लगता था। दुर्गा पूजा से ठीक पहले मेरी कॉलेज की छुट्टियाँ शुरू हो गयी थी। आज सप्तमी है, और मेरे शहर सिलीगुड़ी का मिजाज ही बदला हुआ है। दुर्गा पूजा के भव्य पंडालों ने शहर की शोभा में चार चाँद लगा दिए हैं। आज रात को इन पंडालों की शोभा कुछ और बढ़ाने के बाद मैं कल सुबह अपने गाँव मेटेली जा रहा हूँ, छुट्टियाँ बिताने।

अलार्म की आवाज से आँख खुली तो पता चला सुबह के ५ बज गए हैं, और मुझे ६ बजे की बस पकड़नी है। रात को घूमने के चक्कर में कुछ न हो पाया और अब १ घंटे में सब कुछ कर के बस भी पकड़नी है। आखिर में किसी तरह भाग भाग कर मैंने बस पकड़ ही ली। बस में बैठते ही बड़ी जोर की नींद आयी और सीधे मेटेली में मेरी आँखें खुली। थकावट इतनी ज्यादा थी की कंडक्टर के ३-४ बार उठाने के बाद मैं होश में आया।

बस से उतरते साथ मुझे याद आया की आज महाअष्टमी है, जिसे मैं मेटेली की हवा में महसूस कर पा रहा था। अगरबत्ती की खुशबु, धुप की सुगन्घ चारो तरफ फैली हुयी थी। मौसम एकदम बढ़िया था। सुबह हलकी ठंड और साफ़ थी। हलकी हलकी हवा चल रही थी जो मेरे गालों को हौले से सहला जाती थी। दुरी पर दो बड़े बड़े हरियाली से ढके पहाड़ साथ खड़े थे, मानो मेरी स्वागत की पूरी तैयारी थी।

माँ के आग्रह पर मैं अष्टमी को घर आया था, वो मुझे अपने साथ कालीबाड़ी ले जाना चाहती थी। क्यूंकि मेरे छोटे भाई ने कालीबाड़ी जाने से साफ़ साफ़ मना कर दिया था तो बचा सिर्फ मैं। मैंने इस बार की दुर्गा पूजा दोस्तों के साथ घूमने का प्लान बना रखा था और दशमी के बाद ही मेरा घर आने का विचार था। पर मैं पूरी दुनिया को मना कर सकता हूँ, माँ को नहीं। घर पहुँचते ही मैंने माँ और पापा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और चला गया नहाने। नहाकर आया तो देखा की गरमा गरम चाय तैयार है। चाय की प्याली लेकर मैं बरामदे में आकर बैठ गया। ठण्ड का मौसम और गरम चाय की चुस्की, आनंद ही कुछ और था। चाय की चुस्की लेते हुए मैं कुछ सोच रहा था की पायल की आवाज ने ध्यान तोड़ दिया। नजरें घुमाई तो देखा की पड़ोस के आँगन में एक लड़की भीगे कपड़ों को रस्सी पर टांग रही थी।

सफ़ेद चूड़ीदार और सांवला रंग। रंग सांवला होते हुए भी काफी हद तक गोरेपन की तरफ था। मैं तो बस उसे निहारता ही रह गया। खामोश जादूमयी आँखें, लम्बी नाक, तराशे हुए होठ, चौड़ा ललाट,पीठ से निचे तक लटके हुए लम्बे बाल – जहाँ तक नजर गयी, वो खूबसूरत ही लगती गयी। कद लगभग ५ फुट ६ इंच के आस पास होगा, जो एक लड़की के हिसाब से काफी अच्छी लम्बाई है। इस लम्बाई पर पतली छरहर काया, मेरा ध्यान खींचने के लिए काफी थी। मेरी आँखें एकटक बस उसे ही निहार रही थी की शायद उसे एहसास हो गया की कोई है जो उसे घूर रहा है। उसने बाल्टी से कपडे निकालते हुए तिरछी नजरों से मेरी तरफ देखा तो हमारी नजरें टकरा गयी और मैं घबरा के इधर उधर ताकने लगा और चुप चाप चोरों की तरह उठकर अपने कमरे में चला आया।

गलती मेरी नहीं थी, वो थी ही कुछ ऐसी। नजर तो बस उससे चिपक के रह गयी थी।

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