अवन्ति-एक प्रेम कहानी (दृश्य ४ – बस)

आज का दिन बड़ा सुहाना था, अभी सुबह के ८ बजे थे और हलकी हलकी धुप निकली हुयी थी। मैं आज मालबाजार जा रहा था, इंटरनेट कनेक्शन की अर्जी देने के लिए। बस स्टॉप पर मेरे साथ और ४ लोग खड़े थे और बस के आने का इन्तेजार हो रहा था। बस का समय वैसे ८ बजे ही है, पर वो बस अक्सर १०-१५ मिनट लेट ही आती है।

ठीक ८ बजकर १० मिनट पर मुझे बस की सीटी सुनाई दी, नजर उठाकर देखा तो बस आ रही थी, पर बस में लदे लोगों की भीड़ ने मन बेचैन कर दिया। चूँकि अगली बस एक घंटे बाद की थी, मैंने भी उसी बस में जाने का मन बना लिया और बस में चढ़ने की लाइन में जाकर खड़ा हो गया। बस अब हमारे स्टॉप पर पहुँचने ही वाली थी की मुझे किसी के पुकारने की आवाज सुनाई दी। मुड़कर देखा तो अवन्ति दौड़ी चली आ रही थी, मेरा नाम लेते लेते हाथों से कुछ इशारा कर रही थी। वो इशारा बस को थोड़ी देर और रुकवाने का था, जिसका अंदाजा मैंने उसे दौड़ते देख कर ही लगा लिया था। बस आयी, बड़ी मुसक्कत कर के मैं बस में चढ़ा और कंडक्टर से बात कर के अवन्ति को भी बस में चढ़वाया।

अवन्ति किसी तरह बस में चढ़ तो गयी पर लोगों की भीड़ में दबी कुचली सी लाचार खड़ी थी। मैं उससे थोड़ी दूर खड़ा था। जब मेरी नजर उसकी तरफ गयी तो उसने दबी जबान में मुझे धन्यवाद कहा। मैंने भी मुस्कुरा कर उसका जवाब दिया।

अभी बस एक किलोमीटर के लगभग चली होगी की एक भलेमानुष ने अपनी सीट छोड़कर अवन्ति को बैठने के लिए कहा और मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। अवन्ति ने उसका आभार व्यक्त किया और जाकर उसकी सीट पर बैठ गयी।

मेरे गाँव से मालबाजार की दुरी कुल १५ किलोमीटर है। बीच में एक जगह आती है – चालसा।

अवन्ति के बगल में जो लड़का बैठा था, उसे चालसा में ही उतरना था। वो लड़का जब चालसा के बस स्टॉप पर उतरने लगा तो अवन्ति ने मेरी तरफ देख कर इशारा किया की मैं उसके बगल में आकर बैठ जाऊं। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था। मैं अभी भी वो सुबह वाली घटना याद कर कर के और ये सोच कर परेशान हो रहा था की बगल में बैठने पर पता नहीं क्या पूछेगी? कहीं ये पूछ लिया की तुम मुझे क्यूँ घूर रहे थे? मैं इन्ही उधेड़बुन में फंसा हुआ था की कोई और आकर अवन्ति के बगल में बैठ गया, और अवन्ति उसे मना भी नहीं कर पाई। वो लड़का कोई और नहीं, वही था, जिसने अपनी सीट अवन्ति को दी थी। अवन्ति ने फिर बड़ी लाचार नजरों से मेरी तरफ देखा और मैंने उसे इशारों में समझा दिया की मैं ऐसे ही ठीक हूँ।

कुछ ही देर में हमारी बस मालबाजार पहुच गयी और हम दोनों एक दूसरे को बाय बोलकर अपने अपने काम के लिए अलग अलग रास्ते पे निकल पड़े।

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