जब तुम मिले

वक़्त ठहर सा गया होगा,
मोहब्बत की ओस गिरी होगी,
बहती हवाओं ने छुआ था शायद,
जब तुम मिले,

समय की उस पहेली में कुछ ख़ास था,
कुछ तो जोड़ रहा था दिल को हमारे,
एक मुस्कान थी चेहरे पर मेरे,
जब तुम मिले,

कुछ तो बात थी तुम्हारी अदा में,
उलझन और खुशियाँ साथ दिख रही थी,
फिर मेरे हाथों में आया तुम्हारा हाथ,
जब तुम मिले,

कुछ तो बात थी उस छुअन में,
एक अलग एहसास था, और,
दिल की धड़कन बढ़ गयी थी,
जब तुम मिले,

तेरे पलकों के इशारें कुछ तो कह रहे थे,
अब तुम ही बताओ उन इशारों की सदाएँ,
कैसे थे हालात तुम्हारे?
जब हम मिले।

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अर्धांगिनी

हमसफ़र की तलाश और सफर लम्बा था,
जहां रुके कदम, वो दर तेरा था,
मिलने की बेचैनी थी और एक एहसास था,
कोई था वहां, जो अब मेरा था,

ख़ुशी क्या होती है, अब मालुम हुआ,
जब भगवान ने मुझे, तुमसे मिला दिया,
पत्नी बनाके, जीने का जरिया बना के,
उम्र भर के लिए ये तोहफा दिया,

वो तोहफा हो तुम, भगवान का मुझे,
जिसे कभी तौल नहीं सकता,
एक प्यार इतना पावन, इतना पवित्र,
जिसे कभी मोल नहीं सकता,

इतना वादा है तुमसे की,
खुद को ढूंढ न पाओगी,
जब मेरी बाहों में आ के,
तुम सीने से लिपट जाओगी,

मेरे जीवन का सबेरा हो तुम,
एक चहकती चिड़िया की तरह,
बड़े लाड से रखूँगा तुम्हे,
एक प्यारी गुड़िया की तरह,

कल तक तुम  मेरी चाहत थी,
अब आदत बन गयी हो,
पहले सिर्फ सोचा करता था,
अब इबादत बन गयी हो।

गाँव का वो घर

अगरबत्ती की सुगन्घ, पूजा की घंटी,
सुनकर आँखें खुलती थी,
जहां रातें भी दादी की कहानियाँ सुनकर सोती थी,
अब लोग नहीं,
यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी,

लोगों की आवाज, शब्दों की भीड़,
सब कुछ सुना है उस आँगन ने,
प्यारा भरे तकरार,भाई-बहन का प्यार,
सब कुछ देखा है उस आँगन ने,
पूजा करती दादी की घंटी की आवाज,
रोटी बेलती माँ के कंगनों की खन खन,
पुरे घर में गोरैया की तरह फुदकती,
बहनों के पायलों की छन छन,
और ना जाने कितने मधुर आवाजों को,
अपने दामन में संजोये हैं,
ख़ुशी और ग़म की सारी यादों को,
एक धागे में पिरोये हैं,
उस घर ने सबको छत दिया,
समान प्रेम वो सबसे करती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आँगन में,
जहा पहले किलकारी गुंजा करती थी,

थका हारा जब भी मैं घर आता था,
अपनी नरम मुट्ठी में मुझे छुपा लेता था,
जैसे कोई माँ, बच्चे को आँचल में छुपाया करती है,
उस घर की हर चीज से अलग सा नाता है,
वो शीशम के खम्भे,कत्थई सा दरवाजा,
वो सहमी सी चौखट, अधखुली खिड़कियाँ, सब रस्ता तकती हैं,
बरसों बीत गए उस आँगन को खामोश बैठे हुए,
जो अकेलेपन के नाम से भी डरती थी,
अब लोग नहीं, यादें बसा करती है उस आंगन में,
जहां पहले किलकारी गुंजा करती थी।