बहुत याद आते हो

बीत गए कितने ही मौसम,बीत गए वो अल्हड़पन के दिन,
कभी सोचा नहीं था, जीना पड़ेगा तुम्हारे बिन,
प्यार से जुड़ी हर बात अब तो बेमानी लगती है,
तुझसे जुड़ी हर याद अब तो अनजानी लगती है,
टूट चूका हूँ, बदल सा गया हूँ, ऐसा मैं पहले ना था,
पर ….. तुम अब भी बहुत याद आते हो,

वो छोटी छोटी बातों पे हमारा झगड़ना,
एक दूजे से रूठना, मुंह फुलाकर बैठना,
कभी तेरी हंसी उड़ाई तो,
मेरे बाहों पे हलके मुक्के बरसाना,
अब तो वो यादें भी धूमिल हो चुकी है,
पर …. तुम अब भी बहुत याद आते हो,

एक दूजे को देखते ही, ख़ुशी से चमकना,
मौका मिलते ही, एक दूजे के बाहों में खो जाना,
तेरी गोद में सर रखे, तुम्हारे चेहरे को निहारना,
मेरे बालों में तेरी उंगलियों का फिराना,
वो बातें, अब तो बस कहानी सी रह गई है,
पर … तुम अब भी बहुत याद आते हो,

रातों में जब आँखें बंद करूँ, तो तेरा ही चेहरा नजर आता था,
सुबह आँखें खोलू तो तेरा ही चेहरा देखने का मन करता था,
अब तो नींद भी दगा कर रही है, खुली आँखों से रातें गुजर रही है,
जिन आँखों में पूरी रात समा जाती थी, उनमे अब सबेरा का एहसास तक नहीं,
पर … तुम अब भी बहुत याद आते हो,

ये सारी बातें जो कभी वर्तमान थी, अब अतीत है,
कभी हकीकत थी, अब यादें बन चुकी है,
तुम हो ना पाई मेरी, मैं ना हो सका तेरा,
ये एहसास अब किसी कोने में दफन हो चूका है,
पर … तुम अब भी बहुत याद आते हो।।

Advertisements

खुशियाँ

सहरा में तब बारिश होगी,
रेत में भी तब फूल खिलेंगे,
बंजर माटी का सूनापन,
तब हरियाली में बदलेगा,
जब दो प्रेमी,
प्यार में डूबे,
सूली चढ़ने को आतुर हो,
और ज़माना,
अहम को छोड़,
उनकी खुशियाँ चाहेंगे।

वो कल

चल वापस वहीँ, जहा सुनहरे पल छोड़ आये थे,
जहाँ हमने सुन्दर भविष्य के सपने सजाये थे,

वो चिढ़ाना , वो भागना, वो प्यार से मनाना,
वो बाहों में बाहें और सडकों का किनारा,
वो घंटो तक बातें और दूर तक जाना,
वो कल था, मधुर था, प्यारा था, जीवन हमारा,

वो सर्दी की शामें और चोरी छिपे मिलना,
वो बारिश का मौसम और बचने को भागना,
वो पानी से सराबोर हवा का तन को छूना,
वो सर्द से काँपना और एक दूजे से लिपटना,

वो गलियाँ, वो सीढ़ियाँ , वो नदिया किनारा,
वो पेड़, वो छाँव, वो तने का सहारा,
वो हंसी, वो ख़ुशी, वो आँखों का इशारा,
चल लौट चले उस पल में, जो पल था हमारा।

वो साल

वो साल अनोखा था,
एक हवा का झोका था,
थोड़ी गम की बारिश थी,
खुशियों का झरोखा था,

कुछ पुराना पीछे छूट गया,
कुछ नयी हाथों का सहारा मिला,
अच्छी यादों को मन में सजाके,
भूल गया हर शिकवा-गिला,

अब नए साल के नए रंग में,
हम घुल-मिलकर रम जाएंगे,
उम्मीदों-आशाओं का आँगन होगा,
हँसते-गाते हम यूँ ही जीते जाएंगे।

किताबेँ

किताबों से जो नाता था पुराना,
वो अब कट सा गया है,
वो नाता था अनोखा,
शायद अब भी कुछ रह सा गया है।
कभी हाथों में तो कभी सिरहाने तले,
कभी छाती पे तो कभी गोद में डेरा जमाते थे,
जुबां पर एक अलहदा जायका आता था,
जब कभी पन्नों को पलटाते थे।
नयी किताबों की खुशबू एक अलग एहसास था,
जब हम किताब से नाक को ढके पूरी सांस अंदर भरते थे,
अलग स्नेह होता था तब,
जब हमारे हस्ताक्षर पहले पन्ने पे हुआ करते थे।
अब नया है माहौल और नयी है जमीन,
जहाँ होता था किताबों का ढेर, अब होती है मशीन,
अब न हाथों में , ना सिरहाने तले,
अब तो वो अलमारियों की तख्तों पे सजती है,
महीनो तक अब मुलाकातें नहीं होती,
बड़ी हसरत से वो तकती है।
वो दौर ही अलग था,
जब किताबों से सूखे फूलों की खुशबू आती थी,
उन्हें गिराने और उठाने में कितने रिश्ते बनते थे,
अब वो दौर कहाँ,
अब तो वो अलमारियों की तख्तों पे सजती है,
महीनो तक अब मुलाकातें नहीं होती,
बड़ी हसरत से वो तकती है।

पर वो नहीं आई

“मेरे अनुज अभिषेक गांगुली को समर्पित रचना – ”

निमिया तले, छाओं में बैठे,
पुरबइया बहे, मन कुछ कहे,
ना जाने वो कब आएगी,
इंतजार अब लम्बा हो रहा,
पलकें भी थक हार गयी,
पर वो नहीं आई,

पल पल लगे भारी,
आस अब भी बची,
अब तो आ जाओ,
कितने इम्तेहां लोगी हमारी,
कुछ गाने प्यार के,
कुछ वियोग के,
सब याद आ गए,
पर वो नहीं आई,

एक टीस सी उठी दिल में,
शायद न मिल पाने का दर्द,
अब मन कुछ कहे,
और दिल कहे कुछ और,
इसी उधेडबुन में फँसे रहे,
की तारे देने लगे दिखाई,
पर वो नहीं आई।

फरियाद

मानसून की बेला है,
ये बूँदों का मेला है,
झमझम करते सावन ने,
तन को मेरे भिगो दिया,,
अतिरेक उल्लास ने फिर,
मन को मेरे भिगो दिया,
फिर बारिश घनघोर हुई,
धरती भी सराबोर हुई,
पर जहाँ है सुखा,
हर बच्चा भूखा,
सुखी माटी सुनी है,
हर राहत अनसुनी है,
एक बूँद के लिए, गयें हैं तरस,
ए बारिश जरा उधर भी बरस,
 
बारिश होगी, जीवन होगा,
हर समां रंगीन होगा,
हरियाली लहरायेगी,
कई मुखड़े खिल सी जायेगी,
नयी कोंपलें संग,
नयी जीवन की शुरुआत होगी,
सूखे डालों पर,
जब बूँदों की बरसात होगी,
हर कली को फूल और,
हर बाग़ को गुलशन कर जायेगी,
सावन की बूँदें जब,
प्यासी धरती से मिलने आएगी,
अब आँचल में बूँदें भर ले,
और याद उन्हें तू कर ले,
जिन्हे भूल गयी थी पिछले बरष,
ए बारिश जरा उधर भी बरस।

मौसम की मार

पतझड़ की नहीं,
बस कुछ दिन पहले की बात है,
पेड़ों से हरियाली नदारद थी,
जमीन पे पड़े अधसूखे  पत्ते,
मौसम की मार को बयाँ कर रहे थे,
उनकी जीवन लीला अभी और थी,
वो असमय ही पेड़ों से गिर पड़े थे,

जिन तेज हवाओं में,
शाख और पत्तें साथ झूमा करते थे,
उनका साथ में लहलहाना भी,
एक मधुर संगीत की श्रिष्टि करता था,
शाख से जुदा क्या हुए,
पत्तो का कोई अस्तित्व ही न रहा,
तेज हवाओं की ठोकर ,
उन्हें जहाँ तहाँ बिखेर रही है,
अब  तो बस पत्तों की लाश बिछी है,
और रेगिस्तान सा माहौल है।